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बंजर बादल चूम रहे हैं/फिर से प्रेत शिलाएं

बंजर बादल चूम रहे हैं

फिर से प्रेत शिलाएं

लोकतंत्र की

लाश फूलती

गंध भरे

गलियारों में

यहां-वहां बस

काग मचलते

तुष्‍ट-पुष्‍ट

ज्‍योनारों में

नित्‍य बिकाउ नारे लेकर

चलती तल्‍ख हवाएं

गंगा का भी

संयम टूटा

वक्र बही

शत धारों में

क्षुब्‍ध, कुपित

पर्वत, हिमनद भी

कह गए बहुत

ईशारों में

पछताते चरणों से लौटी

कितनी विकल दुआएं

निरा अकेला

विक्रम आकर

क्‍या कर लेगा

ऐसे में

बत्‍तीसी की

सभी पुतलियां

सिमट चुकी

हम जैसे में

मूक -शिथिल है आज सभी कुछ

हंसती वैताल कथाएं

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on July 16, 2013 at 1:23pm

behtreen sir ji .........kya baat hai anupam rachna hetu  badhaai aapko saadar

Comment by Neeraj Nishchal on July 12, 2013 at 8:03pm

बहुत ही उम्दा

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 5:49pm

आदरणीय विजय निकोर जी एवं बृजेश जी, आपका हार्दिक आभार, सादर

Comment by vijay nikore on July 12, 2013 at 5:04pm

सुन्दर रचना के लिए बधाई, आदरणीय।

विजय निकोर

Comment by बृजेश नीरज on July 12, 2013 at 5:00pm

वाह आदरणीय! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई! 

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 2:27pm

आदरणीया प्राची जी, आपको रचना अच्‍छी लगी, मन आश्‍वस्‍त हुआ, ना चाहते हुए भी आक्रोश की अभिव्‍यक्ति स्‍वत: ही कभी-कभी ऐसे  हो जाती है, आप हमेशा ही मार्गदर्शन करती रही हैं जो मुझे बहुत कुछ सीखने की दिशा में अग्रसर करती रहती है, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 2:25pm

आदरणीय डॉ0 आशुतोष जी, सुमित नैथानी जी, अरून जी आप सबका हार्दिक आभार, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 2:24pm

आदरणीय सौरभ जी, आपका इंगितार्थ मैं समझ गया, कोशिश जरूर करूंगा कि सिपिया या सफेदा ही चखने को मिले, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on July 12, 2013 at 2:22pm

आदरणीय राम शिरोमणि जी एवं केवल जी, रचना को समय देने के लिए आपका हार्दिक आभार

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 12, 2013 at 12:35pm

आदरणीय राजेश भाई जी बहुत ही सुन्दर समसामयिक रचना , भाव बहुत ही रोचक है पढ़कर मजा आया. हार्दिक बधाई स्वीकारें.

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