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ग़ज़ल : वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो

बहर: हज़ज मुसम्मन सालिम

वही दिलकश नज़ारा हो वही मौसम सुहाना हो,

वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो,

जुबां से कह नहीं पाया नज़र से तुम नहीं समझी,

बताना हो बड़ा मुश्किल कठिन उससे छुपाना हो,

पलटकर देखना तेरा ग़लतफ़हमी सही मेरी,

इसी धोखे के चलते बेवजह हँसना हँसाना हो,

अदा इक तो सनम कातिल खुदा से तुमने है पाई,

गिरे बिजली मेरे दिल पे जो तेरा भीग जाना हो,

चुराने आँखों से काजल फलक से आ गए बादल,

घटा घनघोर घिर आये जो नज़रों का झुकाना हो.

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:43am

आदरणीय अशोक सर जी बहुत बहुत शुक्रिया आशीष एवं स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:43am

आदरणीया राजेश जी आपका आशीष मिला ग़ज़ल मुकम्मल हुई, आशीष एवं स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:42am

आदरणीया प्राची दीदी ग़ज़ल के भाव आपको पसंद जानकार हार्दिक प्रसन्नता हो रही है, प्रयास सफल हुआ आशीष एवं स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:41am

आदरणीया प्रज्ञा जी एवं आदरणीया महिमा श्री जी हार्दिक आभार आप दोनों का.

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:40am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय विजय सर एवं शिज्जू सर

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:40am

शुक्रिया नीरज भाई जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:39am

हार्दिक आभार आदरणीय विजय सर आशीष यूँ ही बनाये रखिये

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:39am

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीया प्रवीन मलिक जी

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 18, 2013 at 10:38am

हार्दिक आभार आदरणीय प्रिय मित्रवर संदीप भाई जी स्नेह यूँ ही बनाये रखिये.

Comment by Ashok Kumar Raktale on July 18, 2013 at 7:53am

वही दिलकश नज़ारा हो वही मौसम सुहाना हो,

वही खिलते हुए फूलों सा तेरा मुस्कुराना हो,............वाह! बहुत सुन्दर मतला.

भाई अरुण जी बहुत मस्त गजल कही है. दिली दाद कुबुलें.

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