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ग़ज़ल - दुआओं की तिजारत हो रही है !

ग़ज़ल -
.

भुलाए पर, यहाँ तक भी न कोई ।

सताए पर, यहाँ तक भी न कोई ।

मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,
निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।

मुहब्बत से भरोसा उठ गया है ,
सताए, पर यहाँ तक भी न कोई ।

फिर औलादें ही अपनी गलियां दे,
लुटाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
पतंगे खेल  कुदरत के बिगाड़ें ,
उड़ाए, पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दुआओं की तिजारत हो रही है
कमाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
किया माँ बाप का एहसान समझें ,
पढ़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दो बेटों में बंटें माँ बाप बिखरे ,
लड़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
               
* सर्वथा मौलिक और अप्रकाशित 
                  -   अभिनव अरुण 
                 [may - june 2013]
              

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on July 26, 2013 at 2:57pm

अशआर पसंद आये बहुत आभार श्री नीरज जी !

Comment by Abhinav Arun on July 26, 2013 at 2:56pm

स्नेह सिक्त हुआ आदरणीय श्री अरुण अनंत जी बहुत धन्यवाद !!

Comment by Abhinav Arun on July 26, 2013 at 2:56pm

आपने शेरो की तार्किक समीक्षा प्रस्तुत कर मनोबल बढाया है बहुत आभार आदरणीय श्री विजय जी 

Comment by Abhinav Arun on July 26, 2013 at 2:55pm
जी आपकी बधाई बहुत मायने रखती है आदरणीया गीतिका जी बहुत शुक्रिया आपका !!
 - 
Comment by वेदिका on July 26, 2013 at 12:59pm

वाह वाह, ये गज़ल भी कमाल,,

बहुत बहुत बधाई लीजिये आदरणीय अभिनव अरुण जी!    

Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 12:33pm
" किया माँ बाप का एहसान समझें ,
पढ़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दो बेटों में बंटें माँ बाप बिखरे ,
लड़ाए पर यहाँ तक भी न कोई । " -- सांसारिक आवोहवा और बदलते रिश्तों की गुम होती अहमियत पर सीधी ऊँगली तानने के लिए साधुवाद ,अभिनवजी .सारगर्भित किन्तु सरल सुंदर रचना .
Comment by विजय मिश्र on July 26, 2013 at 12:31pm
" किया माँ बाप का एहसान समझें ,
पढ़ाए पर यहाँ तक भी न कोई ।
.
दो बेटों में बंटें माँ बाप बिखरे ,
लड़ाए पर यहाँ तक भी न कोई । " -- सांसारिक आवोहवा और बदलते रिश्तों की गम होती अहमियत पर सीधी ऊँगली तानने के लिए साधुवाद ,अभिनवजी .सारगर्भित किन्तु सरल सुंदर रचना .
Comment by Abhinav Arun on July 26, 2013 at 8:08am

आदरणीय श्री वीनस जी आपकी तारीफों पर खरा कहने उतरने का प्रयास जारी रहेगा . सभी स्नेह पुष्पों को गंठिया लिया है उनकी सुगंध आपको मिलती रहेगी . बहुत आभार आदर सहित !

Comment by वीनस केसरी on July 26, 2013 at 3:13am

मुझे हर आइने ने झूठ बोला ,
निभाये, पर यहाँ तक भी न कोई ।

मुकम्मल ग़ज़ल ......

शानदार
जानदार ...
लाजवाब
बहुत खूब
बेहतरीन
वाह वा
अद्भुत ..... आदि आदि आदि

Comment by अरुन 'अनन्त' on July 25, 2013 at 10:19pm

वाह क्या खूब क्या खूब ग़ज़ल कही है भाई जी, बहुत बहुत बधाई इस सुन्दर ग़ज़ल हेतु.

कृपया ध्यान दे...

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