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घिर आये स्याह बादल सरे शाम

घिर आये स्याह बादल सरे शाम
स्याह*-काले
और उदास ये जेहन क्यूँ हुआ
जेहन*-मन
पोशीदाँ अहसास क्यूँ उभर आये
पोशीदाँ*-छुपा हुआ
ये दिल तनहा दफ्फअतन क्यूँ हुआ
दफ्फअतन*-अचानक
यूँ तो अब तक चेहरे की ख़ुशी छुपाते थे
ग़म छुपाने का ये जतन क्यूँ हुआ
कोई चोट तो गहरी लगी होगी
ये संगतराश यूँ बुतशिकन क्यूँ हुआ
संगतराश*-मूर्तिकार, बुतशिकन*-मूर्तिभंजक
दुष्यंत......

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Comment

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Comment by दुष्यंत सेवक on May 21, 2010 at 11:38am
ganesh jee ke agrah par maine urdu shabdon ke hindi arth likh diye hai....yakeen maniye maine in shabdon ka upyog panditya bagharne ke liye nahi kiya man me yehi shbd aaye the to likh diye....koshish karunga thode grahya shabdon ka upyog karu.....sabhi pratikriyaon ke liye tah e dil se shukriya....mujhe apki pratikriyaen aur behtar likhne ke liye prerit karengi dhanyavaad

प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 21, 2010 at 10:03am
Very nice indeed - keep it up Dushyant bhai.
Comment by Khushboo on May 21, 2010 at 9:55am
यूँ तो अब तक चेहरे की ख़ुशी छुपाते थे
ग़म छुपाने का ये जतन क्यूँ हुआ
bahut badhiya dushyant jee.....keeo it up......
Comment by PREETAM TIWARY(PREET) on May 21, 2010 at 9:54am
घिर आये स्याह बादल सरे शाम
और उदास ये जेहन क्यूँ हुआ
पोशीदाँ अहसास क्यूँ उभर आये
bahut hi badhiya dushyant bhai......aapki pehli rachna hai ye aur ekdam shaandaar hai...

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on May 20, 2010 at 8:43pm
दुष्यंत भाई अच्छी ग़ज़ल है, आग्रह है की जैसे आपने अपने दूसरे ग़ज़ल मे उर्दू के कठिन शब्दो का हिन्दी तेर्जनूमा लिख देंगे तो समझने मे हम जैसो को और भी सहूलियत हो जाएगी, शुक्रिया,
Comment by दुष्यंत सेवक on May 20, 2010 at 1:02pm
dhanyavaad admin sahab....zarranavazi ka shukriya...inayat rahi to aage bhi pesh karta rahunga apne ashaar...
Comment by Admin on May 20, 2010 at 12:57pm
यूँ तो अब तक चेहरे की ख़ुशी छुपाते थे
ग़म छुपाने का ये जतन क्यूँ हुआ
कोई चोट तो गहरी लगी होगी
ये संगतराश यूँ बुतशिकन क्यूँ हुआ
आदरणीय दुष्यंत सेवक जी ,
प्रणाम,
सबसे पहले तो मै आपके पहले ब्लॉग का ओपन बुक्स ऑनलाइन के मंच पर स्वागत करता हू, आपने बहुत ही उम्द्दा ग़ज़ल लिखा है, आदरणीय योगराज प्रभाकर जी का मै तहे दिल से शुक्रिया करता हू की उन्होने ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार मे आप जैसे बेहतरीन फनकार के रूप मे एक अनमोल हिरा दिया है, बहुत ही सुंदर और ससक्त अभिव्यक्ति है ये गजल आपका, आगे भी आप की रचना का इन्तजार रहेगा, धन्यवाद,

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