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लघुकथा: थोड़ी सी प्यास

किसान हीरा की पत्नी घाट से जो मटका भर कर लाती थी, उसमें छोटा सा छेद हो गया था| उस पर हाथ रखते रखते भी पानी ज़मीन पर गिर ही जाता| जैसे तैसे वो पानी लेकर आती थी|

उसने अपने पति से इस बात की शिकायत की कि, अब इस मटके से पानी भरना संभव नहीं है, आप नया मटका ले आओ| हीरा थोड़ा व्यस्त था, जब तक वो नया मटका खरीदता, तब तक पुराने मटके का छेद काफी बढ़ गया और बहुत सारा पानी तो रास्ते में ही गिर जाता|

नया मटका आते ही पुराना मटका हीरा की पत्नी ने बाहर फैंक दिया, वहां काफी कीचड़ थी, उसमें मटका घुल गया| मटके के गिरे हुए पानी ने धरती की शायद थोड़ी सी प्यास बुझाई थी, इसलिये धरती ने अपनी गोद में जगह दे दी...

थोड़ी सी प्यास बुझाने का क़र्ज़ चुकाया....शायद यही अंतर है, प्रकृति और इंसान में !

 

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 565

Comment

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Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 26, 2013 at 11:53pm

सौरभ पाण्डेय जी सर बहुत शुक्रिया, सही कहा आपने मान्य कहाँ हो पता है, लेकिन ये कलम ही है जो कभी ना कभी मनवा के रहेगी| बस अच्छे लोगो के आशीर्वाद की ज़रुरत है|


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 11, 2013 at 3:01pm

अंतर स्पष्ट है लेकिन मान्य कहाँ हो पाता है. 

बढिया प्रयास हुआ है. 

बधाई

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 5, 2013 at 3:58pm

मीना पाठक जी, आपकी बधाई के लिए ह्रदय से आभार 

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 5, 2013 at 3:57pm

अरुन शर्मा जी, आपका तहे दिल से शुक्रिया

Comment by Dr. Chandresh Kumar Chhatlani on August 5, 2013 at 3:57pm

आदरणीय बृजेश नीरज जी, आपका ह्रदय से आभार व्यक्त करता हूँ. 

Comment by Meena Pathak on August 5, 2013 at 1:26pm

सुन्दर लघुकथा .. हार्दिक बधाई 

Comment by अरुन 'अनन्त' on August 5, 2013 at 12:42pm

शिक्षाप्रद लघु कथा बहुत ही सुन्दर हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by बृजेश नीरज on August 4, 2013 at 6:49pm

अब क्या कहूं। आपके इस सुन्दर प्रयास पर आपको हार्दिक बधाई!

कृपया ध्यान दे...

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