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हो नहीं आक्रांत,
समर्पण भाव पर
सुर्ख आह्लाद की
जो छाप है,
भाव उन्नत उपजते
बुद्धि उर्वर,विवेक में
समृद्ध मनन का निवास है,
ना विकलता,
उर में यदि
धवल शान्ति का
प्रकाश विद्यमान है,
जीवन्तता
निरन्त चक्र सम
चैतन्यता
रग-रग मे तुम्हारे जो व्याप्त है,
तो समझ लो
हे आत्मन्!
ये तुम्हारा ही नहीं
राष्ट्र का उत्थान है।
स्व से उठकर
'पर' पर जो तुम्हारा राग है,
ध्वज तुम्ही हो,आन और...
राष्ट्र-गौरवगान हो।
-विन्दु
(मौलिक/अप्रकाशित)

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Comment by Vindu Babu on August 29, 2013 at 11:32am
आदरणीय सौरभ सर नमस्कार!
आपकी अनुमोदक टिप्पणी ने रचना का बहुत महत्व बढाया है।
स्नेह बनाए रखें आदरणीय।
सादर

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on August 26, 2013 at 1:56pm

व्यष्टि का समुच्चय ही समष्टि है यदि साहचर्य समुन्नत अवस्था में हो. इसी समष्टि भाव का भौतिक प्रतीक ध्वज होता है. ध्वज अवधारणा है नकि मात्र निरुपण. इसी अवधारणा को प्रस्तुत करती आपकी प्रस्तुत रचना भली लगी. 

तनिक और खोलतीं तो कविता और कुछ कहती.

बहरहाल, आपको आपके प्रयास केलिए हार्दिक बधाइयाँ. शुभेच्छाएँ

Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 7:07pm
आदरणीया गीतिका जी आप जैसे विज्ञों से तो (बहुत सुन्दर रचना के अतिरिक्त भी) कुछ सुधारात्मक टिप्पणी की सादर अपेक्षा करती हूं।
आपकी बहुमूल्य टिप्पणी के लिए आपका बहुत आभार!
स्नेह बनाए रखें।
सादर
Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 7:00pm
आदरणीय राजनवादवी जी आपकी बहुमूल्य टिप्पणी शिरोधार्य है।
आदरणीय मुझे ज्यादा अनुभाव नहीं,निवेदन है महोदय 'विन्यास के गठाव' के बारे में कुछ बताएं।
सादर प्रतीक्षा में
वन्दना
Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 7:00pm
आदरणीय राजनवादवी जी आपकी बहुमूल्य टिप्पणी शिरोधार्य है।
आदरणीय मुझे ज्यादा अनुभाव नहीं,निवेदन है महोदय 'विन्यास के गठाव' के बारे में कुछ बताएं।
सादर प्रतीक्षा में
वन्दना
Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 6:58pm
आदरणीय राजनवादवी जी आपकी बहुमूल्य टिप्पणी शिरोधार्य है।
आदरणीय मुझे ज्यादा अनुभाव नहीं,निवेदन है महोदय 'विन्यास के गठाव' के बारे में कुछ बताएं।
सादर प्रतीक्षा में
वन्दना
Comment by वेदिका on August 21, 2013 at 6:56pm

बहुत खूबसूरत रचना आदरणीया वन्दना जी!

बधाई !! सादर !!

Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 6:55pm
आदरणीया अन्नपूर्णा जी,आदरणीय श्यामनारायण जी,आदरणीय रविकार जी,आदरणीयराम शिरोमणि जी सहित आप सभी को पावन पर्व रक्षाबन्धन की ढेरों शुभकामनाएं।
आपकी बधाइयां मुझे हार्दिक प्रसन्नता के साथ स्वीकार्य हैं,आपलोग भी मेरा सादर धन्यवाद स्वीकारें।
सादर
Comment by Vindu Babu on August 21, 2013 at 6:50pm
आदरणीय निकोर सर नमस्ते!
आपको मैं अतुकान्त रचनाओं के महारथी मानती हूं,कुछ सुधार सुझाएं महोदय तो मेरी रचनाओं मेभी कुछ निखार आ सके।
आपने रचना का अनुमोदन किया इसके लिए आपका बहुत आभार
सादर
Comment by vijay nikore on August 20, 2013 at 5:00pm

//भाव उन्नत उपजते
बुद्धि उर्वर,विवेक में
समृद्ध मनन का निवास है,
ना विकलता,
उर में यदि
धवल शान्ति का
प्रकाश विद्यमान है,//

रचना सदैव समान अति सुन्दर भावों से सुसज्जित है, आदरणीया वंदना जी।

सादर,

विजय निकोर

 

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