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सुखद स्मृतियाँ

दुमहले के ऊँचे वातायन से

हलके पदचापों सहित  

चुपके से होती प्रविष्ट

मखमली अंगों में समेट

कर देती निहाल

स्वयं में समाकर एकाकार कर लेती

घुल जाता मेरा अस्तित्व

पानी में रंग की तरह

अम्बर के अलगनी पर

टांग दिए हैं वक्त ने काले मेघ

चन्द्रमा आवृत है , ज्योत्सना बाधित

अस्निग्ध हाड़ जल रहा

सीली लकड़ियों की तरह

स्मृति मञ्जूषा में तह कर रखी हुई हैं

सुखद स्मृतियाँ.....

.. नीरज कुमार ‘नीर’

पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित ..

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Comment

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Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on August 25, 2013 at 9:16pm

सुखद स्मृतियों के आस पास रची गयी एक अच्छी रचना के लिये बधाई !!!!

Comment by Neeraj Neer on August 25, 2013 at 8:50pm

आदरणीय केवल प्रसाद जी हार्दिक आभार .

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on August 25, 2013 at 8:30pm

आ0 नीरज नीर भाई  जी,  सादर प्रणाम!     सुन्दर भाव प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकारें। सादर,

Comment by Neeraj Neer on August 25, 2013 at 7:04pm

बहुत आभार डॉ आशुतोष मिश्र जी 

Comment by Neeraj Neer on August 25, 2013 at 7:04pm

बृजेश जी सदर आभार 

Comment by Neeraj Neer on August 25, 2013 at 7:04pm

बहुत आभार आदरणीय गिरिराज भंडारी जी ..

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 25, 2013 at 1:47pm

सुखद स्मृतियां जीवन की बहुत बड़ी पूंजी हैं ..इन्हें संजोये रखिये ..बेहतरीन तरीके से भावों की अभिव्यक्ति सादर बधाई के साथ 

Comment by बृजेश नीरज on August 25, 2013 at 9:22am

वाह! बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2013 at 8:05am

भाव स्थिति का सुन्दर चित्रण , बधाई , भाई नीरज !!!!!!!

Comment by Neeraj Neer on August 24, 2013 at 10:20pm

आदरणीय डॉ प्राची सिंह जी हौसला बढ़ने के लिए  हार्दिक आभार आपका

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