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लघु कथा - इज्जत (शुभ्रा शर्मा 'शुभ ')

श्रवण की बहन श्रद्धा सरकारी अस्पताल में भर्ती थी | विधवा माँ श्रद्धा से मिलने को व्याकुल थी |श्रवण असमंजस में था कि माँ को कैसे रोके | उसके सास ससुर श्रावण पूर्णिमा में गंगा स्नान करने को आ रहे थे |
श्रवण - माँ :तुम जानती हो रेखा कैसे घर से आयी है, उसे काम करने की आदत नहीं है |समय पर खाना ,नाश्ता देने को तो तुम्हे खुद ही रुक जाना चाहिए था |पर तुम्हे हमारे घर की इज्जत से क्या लेना देना ? तुम्हे तो केवल श्रद्धा चाहिए , वो मरी तो नहीं जा रही है | उसे रोग बढ़ा चढ़ा कर बताने की आदत है |
दो दिनों बाद रेखा के मम्मी पापा जाने ही वाले थे , तभी श्रद्धा के घर वालों का फोन आया कि दाह -संस्कार के समय घाट पर श्रद्धा के भाई को भेज दें , ये हमारी इज्जत का सवाल है |
माँ की आँखों के आँशु अपने एकलौते बेटे बहु को देखकर मानो कह रहें हो कि तुमलोगों की इज्जत तो बच गयी पर मेरी श्रद्धा मर गयी |

शुभ्रा शर्मा 'शुभ '

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by shubhra sharma on September 2, 2013 at 8:03pm

आदरणीय सौरभ पाण्डेय सर , कहानी में वर्णित परिस्थिति  से रु -ब-रु हो टिपण्णी हेतु बहुत बहुत धन्यवाद 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2013 at 12:55am

ऐसा भी होता है ?  उफ़्फ़

सही है, अपने ही ढंग की परिस्थितियाँ हैं.

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 1, 2013 at 12:55am

ऐसा भी होता है ?  उफ़्फ़

सही है, अपने ही ढंग की परिस्थितियाँ हैं.

सादर

Comment by shubhra sharma on August 28, 2013 at 1:03pm

आदरणीया डॉ प्राची जी ,आपलोगों के मार्गदर्शन और आशीर्वाद से काफी मनोबल बढ़ता है , बहुत बहुत धन्यवाद 

Comment by shubhra sharma on August 28, 2013 at 12:58pm

आदरणीय जितेन्द्र जी ,धन्यवाद

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on August 28, 2013 at 10:56am

सच! बड़ी ही हृदयस्पर्शी लघुकथा है, हार्दिक बधाई आदरणीया शुभ्रा जी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on August 27, 2013 at 9:45pm

समाज मैं व्याप्त ऐसी मानसिकता ऐसे परिवारों को देख मन में यही ख़याल आता है कि स्वर्ग और नरक यही है धरती पर ही... क्या कहूँ ऐसे संवेदनहीन बेटे/ भाई की मानसिकता पर... दंग ही हूँ . 

इस अभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई प्रिय शुभ्रा जी 

Comment by shubhra sharma on August 27, 2013 at 7:09pm

आदरणीय विजय मिश्र जी , आजकल श्रवण जैसे संकुचित सोच वाले को आधुनिक सोच वाले पुरुष समझना ही गलत है , आपने बहुत सही टिप्पणी कर मनोबल बढाया है ,बहुत बहुत धन्यवाद  ,  

Comment by shubhra sharma on August 27, 2013 at 7:04pm

आदरणीया   वंदना   जी ,   धन्यवाद

Comment by shubhra sharma on August 27, 2013 at 7:02pm

आदरणीय अभिनव जी ,उत्साहवर्धन करने के लिए   धन्यवाद ,  सादर 

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