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अमृता, तुम नहीं हो फिर भी....

एहसासों की लेखनी में श्रेष्ठ कवयित्री अमृता जी के जन्म दिन के उपलक्ष्य में मेरी एक अदना सी कोशिश, उनको बयां कर पाना आसां नहीं है,बस कोशिश की है....

नज्मों को सांसें

लम्हों को आहें

भरते देखा

अमृता के शब्दों में

दिन को सोते देखा

सूरज की गलियों में

बाज़ार

चाँद पर मेला लगते देखा 

रिश्तों में हर मौसम का

आना - जाना देखा

अपने देश की आन

परदेश की शान को

देसी लहजे में पिरोया देखा

मोहब्बत की इबारत को

खुदा की बंदगी सा देखा

अक्सर मैंने अपने आप को

अमृता की बातों में देखा

शब्द लफ्ज़ ये अल्फाज़

अमर है तुमसे

हाँ, मैंने तुम्हें जब भी पढ़ा

हर पन्ने पर तुम्हारा अक्स है देखा

अमृता, तुम नहीं हो फिर भी

आज हर लेखक को

बड़ी शिद्दत से

तुम्हें याद करते देखा

(मौलिक एव अप्रकाशित)

.......प्रियंका

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Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 31, 2013 at 8:09pm

प्रियंका जी ..इससे ज्यादा अच्छे तरीके से इतनी महान रचनाकार को श्रधा सुमन अर्पित किये हैं आपने वाकई काबिले तारीफ ..मेरी तरफ से आपको हार्दिक बधाई ..सादर 

Comment by Vinita Shukla on August 31, 2013 at 7:47pm

बहुत ही जीवंत, अद्भुत अभिव्यक्ति...हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें.


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 31, 2013 at 6:55pm

प्रियंका जी , बधाई , कोशिश अदना नही आला है !! तेहतरीन !!

Comment by shubhra sharma on August 31, 2013 at 6:49pm

प्रिय प्रियंका  जी  , श्रधान्जली तो बहुत देखी ,सुनी और पढ़ी है , पर आपने महान कवयित्री अमृता जी को जो समर्पित की है वो अनूठा है , आप के संवेदनशील भाव पढ़कर भाव विभोर हो गयी , बहुत बहुत बधाई  स्वीकार करे 

Comment by Manav Mehta on August 31, 2013 at 6:40pm
वाह प्रियंका.... बहुत सुन्दर श्रधांजलि अमृता जी को समर्पित। बहुत बहुत बधाई।

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