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घर ही उजाड़ दिया

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मतलब की दुनिया है

मतलब के रिश्ते हैं

कौन कहे मेले में

आज कहीं अपने हैं

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छोटे से पौधे को

बड़ा किया  प्यार दिया

सींचा सम्हाल दिया

फूल दिया फल दिया

तूफ़ान आया जो

घर ही उजाड़ दिया

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बिच्छू  के बच्चों ने

बिच्छू को खा लिया

इधर – उधर,  डंक लिये

'खा' लो सिखा दिया

------------------------

एक 'बाज' उड़ता था

'सौ' चिल्लाती थी

अधम को थका -डरा

बच कभी जातीं थीं

'सौ' बाज आज 'राज'

लाख उड़े चिड़िया भी

फंदा है फांस आज

'प्रेम' फंसी , जाती अकेली हैं

----------------------------------

नारी ने जना  जिसे

उसने ही लूट लिया

प्रेम-पूत बंधन को

जड़ से उखाड़ दिया

घोंप छुरा पीछे से

कायर ने नाश  किया

-----------------------------

"मौलिक व अप्रकाशित" 

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५

12.35 पूर्वाह्न -01.01 पूर्वाह्न

कुल्लू हिमाचल

२ ५ .० ८ - १ ३

Views: 617

Comment

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Comment by annapurna bajpai on September 4, 2013 at 10:38pm

आदरणीय सुरेन्द्र जी अनुपम रचना के लिए बहुत बधाई स्वीकारें । 

Comment by Meena Pathak on September 4, 2013 at 10:25pm

नारी ने जना  जिसे

उसने ही लूट लिया

प्रेम-पूत बंधन को

जड़ से उखाड़ दिया

घोंप छुरा पीछे से

कायर ने नाश  किया..... बहुत बहुत सुन्दर .... बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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