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!!! आत्मा रोज सफल है !!!

बह्र- 2122 1122 1122 112

दीप तन तेल पिए, गर्व बढ़ाये न बने।
ज्ञान बाती से मिले, तेज बुझाये न बने।।

रोशनी खूब बढ़े, रात छिपाती मुख को,
भोर में भानु उदय, आंख मिलाये न बने।।

हम सफर राह में, मिलते हैं बिछड़ जाते हैं।
छोड़ते दर्द दिलों में, ये मिटाये न बने।।

तेल औ दीप मिले, तर्क खड़ा मौन रहे,
तेज लौ मस्त जले, अर्श बताये न बने।।

आत्मा रोज सफल है, सुविचारक बनकर।
जिन्दगी आज सकल दाग, छुड़ाये न बने।।

सुब्ह से शाम हमें, खौफ रहे दुनिया का।
दर्द दहशत में रहें, तर्ज बनाये न बने।।

बात जब शाह से करते हैं, गरीबों से नहीं।

क्या बने बात जहां, बात बनाये न बने।।

धर्म औ कर्म सदा, साथ रहा करते हैं।
दीन की राह चले, सत्य मिटाये न बने।।

के0पी0सत्यम/मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 8, 2013 at 12:09am

हम सफर राह में, मिलते हैं बिछड़ जाते हैं।
छोड़ते दर्द दिलों में, ये मिटाये न बने।।........यह शेर बहुत पसंद आया

बहुत बहुत बधाई आदरणीय केवल जी

Comment by Meena Pathak on September 7, 2013 at 10:27pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल .. बधाई आप को


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 7, 2013 at 8:30pm

आदरणीय केवल भाई , बहुत बढ़िया , बहुत उम्दा गज़ल हुई है , !! बहुत बधाई !!

Comment by ram shiromani pathak on September 7, 2013 at 3:53pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही है अपने भाई केवल जी,ग़ज़ल को और भी अच्छे तरीके से पेश किया जा सकता है आप सक्षम भी है  //हार्दिक बधाई 

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