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मन के उपजे कुछ हाइकू  आपके समक्ष --

मन के भाव

शांत उपवन में 

पाखी से उड़े .

उड़े है  पंछी

नया जहाँ बसाने

नीड है खाली ।

मन की पीर

शब्दों की अंगीठी से

जन्मे है गीत।

सुख औ दुःख

नदी के दो किनारे

खुली किताब।

मै का से कहूँ

सुलगते है भाव

सूखती जड़े।

मोहे न जाने

मन का सांवरिया

खुली पलकें

मन चंचल

बदलता मौसम

सर्द रातों में।

मन उजला

रंगों की चित्रकारी

कलम लिखे।

मौलिक और अप्रकाशित

 

-- शशि पुरवार

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Comment

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Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on September 12, 2013 at 11:44pm

अति सुंदर रचना, बधाई आदरणीया शशि जी

Comment by बृजेश नीरज on September 12, 2013 at 11:19pm

वाह! बहुत ही सुन्दर हाइकु! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by shashi purwar on September 12, 2013 at 10:23pm

सभी मित्रो का तहे दिक् से आभार

Comment by shashi purwar on September 12, 2013 at 10:23pm

नमस्ते सौरभ जी

चाह  कर भी नहीं आ सकी नेट पर फिलहाल स्वास्थ की परेशानी के कारन कम सक्रीय हूँ चाहकर भी नहीं आ पाती , पर पढ़ती सबको हूँ ,और हमारे आयोजन भी ,टाइप नहीं कर सकती दर्द के कारन इसीलिए कमेंट्स नहीं कर पाती।  आपका रचना पर आकर , समीक्षा देना और बात करना अच्छा  लगा , आभार आपका

Comment by shashi purwar on September 12, 2013 at 10:21pm

प्राची जी नमस्ते आभार , आपकी बात मान्य है , पर दूसरे में तीनो पंक्तियाँ अलग है , और तीसरे में दूसरी और अंतिम पंक्ति में साम्य दिखाई देता है।  इस तरह के अनेक हाइकू  मैंने हाइकू कोष में पढ़े , और एक हाइकू की किताब में भी बहुत पहले , हाइकू के अनेक प्रकार  भी पढ़े थे , उस समय हाइकू साहित्य में पहला कदम था , नया ही लिख रही थी , पर आगे आपकी बात ध्यान रखूंगी , इस बारे में हम और चर्चा खुल कर करेंगे , आभार स्नेह बनाये रखें।

Comment by shashi purwar on September 12, 2013 at 10:13pm

सभी मित्रो का तहे दिल से आभार , आपको हाइकु पसंद आये और आपने यहाँ आकर अपने अनमोल शब्दों से उत्साहवर्धन किया

Comment by vijayashree on September 12, 2013 at 6:49pm

भावपूर्ण हैं 

हर एक हाइकू 

मनभावन 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 11, 2013 at 11:32pm

आदरणीया शशिजी,  एक अरसे बाद आपकी किसी रचना को देख रहा हूँ. अच्छा लगा है. 

वैसे, कुछ हाइकु शिल्प की कसौटी पर तनिक और स्पष्टता की चाहना रखते हैं. अर्थ यह कि कइयों में कमसेकम दो पंक्तियाँ ऐसी हैं जो परस्पर सम्बन्ध में हैं. ऐसा होना हाइकु के शिल्प के लिहाज से कमी है.

इसके बावज़ूद कई पाठक ऐसे हैं जो इस ओर इंगित नहीं कर पाये हैं जबकि उनको इस मंच पर बने एक अरसा हो आया है.

आदरणीया आपके माध्यम से यह कह देना चाहता हूँ कि पाठकों द्वारा बिना तथ्य की समझ के वाह-वाह का तुमुलनाद करना ओबीओ की परम्परा नहीं रही है. नये पाठकों से मुझे कोई शिकायत नहीं है. लेकिन अब कई पुराने हो चले पाठक ऐसा कर रहे हैं तो देख कर दुख होता है. ऐसी वाहवाहियों से गंभीर रचनाकार को कोई लाभ नहीं होता. 

सादर

Comment by अरुन 'अनन्त' on September 11, 2013 at 9:58pm

आदरणीया शशि जी बेहद भावपूर्ण हाइकू बधाई स्वीकारें.

Comment by ram shiromani pathak on September 11, 2013 at 8:42pm

आदरणीया शशि जी,बहुत सुन्दर हायकू हार्दिक बधाई आपको..............

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