एक पुरानी रचना को कुछ गेय बनाने का प्रयास किया है। देखें, कितना सफल रहा।
इन नयनों में आज प्रभू
आकर यूं तुम बस जाओ
जो कुछ भी देखूं मैं तो
एक तुम ही नजर आओ
धरती-नभ दूर क्षितिज में
ज्यों आलिंगन करते हैं
मैं नदिया बन जाऊं तो
तुम भी सागर बन जाओ
वह सूरत दिखती उसको
जैसी मन में सोच रही
सब तुमको ईश्वर समझें
मेरे प्रियतम बन जाओ
देर भई अब तो कान्हा
मत इतना तुम तड़पाओ
लुका-छिपी, खेल न खेलो
मन में मेरे बस जाओ
- बृजेश नीरज
(मौलिक व अप्रकाशित)
Comment
आदरणीया अन्नपूर्णा जी आपका हार्दिक आभार!
रचना पहले की है, कह कर आपने बाँध दिया. :-))))
वैसे, सीखने के लिहाज से यह प्रयास सही है.
लेकिन -
जो कुछ भी देखूं मैं तो
एक तुम ही नजर आओ .. . इन पंक्तियों का आपने क्या कर दिया है, साईं ?
फेलुन फेलुन कीजिये न, इस रचना में गेयता खुद ब खुद बैठती जायेगी.. :-)))
शुभ-शुभ
सुंदर भक्तिरस में रची प्रस्तुति ..बधाई आदरणीय ब्रिजेश जी
आदरणीय ब्रिजेश भाई जी अत्यंत सुन्दर सहज विन्रम प्रेम पगी प्राथना भगवान श्री कृष्ण से की है आपने बहुत ही सुन्दर दृश उकेरा है आपने आनंद आ गया. बहुत बहुत बधाई स्वीकारें भाई जी एक शंका है क्या प्रभू ठीक है. आम बोलचाल में तो बोल देते हैं
धरती-नभ दूर क्षितिज में
ज्यों आलिंगन करते हैं
मैं नदिया बन जाऊं तो
तुम भी सागर बन जाओ///बहुत ही सुन्दर भाव //हार्दिक बधाई आपको आदरणीय भाई ब्रिजेश जी //सादर
आ0 बृजेश भाई जी, बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति। आपको तहेदिल से बहुत-बहुत बधाई। भाई जी कृपया यह बंद पुनः देखना चाहें....
//वह सूरत दिखती उसको
जैसी मन में सोच रही
सब तुमको ईश्वर समझें
मेरे प्रियतम बन जाओ.//..... सादर,
आ0 बृजेश भाई , गेयता तो है !! उम्दा कृष्ण भजन के लिये बधाई !!
अति सुंदर आ0 बृजेश जी , गेयता मुखर हो रही है ये मेरा पक्ष है बाकी अन्य सुधी जन बता सकेंगे । इस भजन को हम सब इस तरह गाते थे ..... दया कर दान भक्ति का प्रभू हमको सिखा देना .....
आपकी रचना का तर्ज कुछ कुछ इसी से मिलता है ।
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