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ग़ज़ल - इल्म की रोशनी नहीं होती !

ग़ज़ल –

२१२२   १२१२   २२

इल्म की रोशनी नहीं होती ,

ज़िन्दगी ज़िन्दगी नहीं होती |

 

एक कोना दिया है बच्चों ने ,

और कुछ बेबसी नहीं होती |

 

रंग आये कि सेवई आये ,

तनहा कोई ख़ुशी नहीं होती |

 

दिल के टूटे से शोर होता है ,

ख़ामुशी ख़ामुशी नहीं होती |

 

सारे चेहरे छुपे मुखौटों में ,

दिल में भी सादगी नहीं होती |

 

माँ के आँचल से दूर हैं बच्चे ,

बाप से बंदगी नहीं होती |

 

जी हुज़ूरी करूँ सलामी दूं ,

मुझसे ये नौकरी नहीं होती |

 

झूठ छाया है हर रिसाले में ,

सच की सुर्खी कभी नहीं होती |

 

*दौरे हाज़िर भी एक बवंडर है ,

आँधियों की कमी नहीं होती |

*संशोधित 

(मौलिक और अप्रकाशित)

        - अभिनव अरुण 

          [१२०९२०१३]

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on October 15, 2013 at 4:25pm

हार्दिक आभार आदरणीय श्री निलेश जी ..धन्यवाद

Comment by Nilesh Shevgaonkar on October 15, 2013 at 4:22pm

वाह वाह और वाह .. क्या ग़ज़ल हुई है .. और ये शेर 

रंग आये कि सेवई आये ,

तनहा कोई ख़ुशी नहीं होती 
.
क्या महीन कारीगरी की है साहब .. ज़िन्दाबाद 

Comment by Abhinav Arun on October 6, 2013 at 7:01am

आपका हार्दिक आभार आदरणीय श्री विजय निकोर जी !

Comment by vijay nikore on October 6, 2013 at 3:12am

बहुत  ही उम्दा गज़ल है...बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

Comment by Abhinav Arun on October 2, 2013 at 6:29am

...हार्दिक आभार आदरणीय श्री संदीप जी सहमत हूँ १०० % !! आभार !!! 

Comment by संदीप द्विवेदी 'वाहिद काशीवासी' on October 1, 2013 at 1:37am
जी हुज़ूरी करूँ सलामी दूं ,
मुझसे ये नौकरी नहीं होती
-- आदरणीय अग्रज.. क्या बग़ावती तेवर और अंदाज़े बयां हैं..! यही वजह है कि कितने ही प्रतिभाशाली उभर ही नहीं पाए! बेहतरीन..!!
सादर,
Comment by Abhinav Arun on September 24, 2013 at 1:14pm

ह्रदय तल से शुक्रिया श्री रविकर जी स्नेह बना रहे यही अभिलाषा है सादर !!

Comment by रविकर on September 24, 2013 at 9:46am

बहुत बढ़िया गजल-
आभार आदरणीय अभिनव जी-
सादर

Comment by Abhinav Arun on September 24, 2013 at 9:02am

आ. चंद्रशेखर जी अश'आर पसंद आये आभार आदरणीय स्नेह बना रहे !

Comment by CHANDRA SHEKHAR PANDEY on September 24, 2013 at 8:55am

आदरणीय अरुन जी, हमेशा की तरह अपने खास अंदाज में कही गयी आपकी इस खूबसूरत गजल के लिए शुक्रिया। सारे अश'आर बेहद बुलंद। बहुत बहुत बधाई


झूठ छाया है हर रिसाले में ,

सच की सुर्खी कभी नहीं होती | 

दिल के टूटे से शोर होता है ,

ख़ामुशी ख़ामुशी नहीं होती |


वाह्ह्ह क्या बात है। 

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