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ग़ज़ल : मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ

वज्न : २१२२, २१२२, २१२

दूरियों का ही समय निश्चित हुआ,
कब भला शक से दिलों का हित हुआ,

भोज छप्पन हैं किसी के वास्ते,
और कोई शस्य से वंचित हुआ,
              (शस्य = अन्न)
क्या भरोसा देश के कानून पर,
है बुरा जो वो भला साबित हुआ,

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,

सभ्यता की देख उड़ती धज्जियाँ,
मन ह्रदय मेरा बहुत कुंठित हुआ..

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by गिरिराज भंडारी on September 15, 2013 at 8:29pm

आदरणीय अरुण भाई , बहुत ही अच्छी गज़ल कही , हर शे र एक एक सच्चाई बयान करता हुआ है !! वह !! बहुत बधाई !!

Comment by Sarita Bhatia on September 15, 2013 at 7:54pm

लाजवाब अरुण 

बहुत बढ़िया गजल हुई है 

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,

सभ्यता की देख उड़ती धज्जियाँ,
मन ह्रदय मेरा बहुत कुंठित हुआ..

खुबसूरत अशआर 

Comment by Abhinav Arun on September 15, 2013 at 7:02pm

सशक्त सामयिक विमर्श की अपेक्षा रखती चिंतन को प्रेरित करती ग़ज़ल के लिए बधाई 

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,

 बहुत खूब वाह !! नारियों की जगह मैं होता तो बेटियों रखता देखिएगा अपनी अपनी राय है ..शुभकामनायें व् अभिवादन अरुण जी !!

Comment by annapurna bajpai on September 15, 2013 at 6:46pm

नारियों सँग हादसे यूँ देखकर,
मैं पिता जबसे हुआ चिंतित हुआ,............... आदरणीय अरुण जी बहुत बढ़िया पंक्तियाँ ,

सभ्यता की देख उड़ती धज्जियाँ,
मन ह्रदय मेरा बहुत कुंठित हुआ........................ आज हर पिता चिंतित है अपनी बेटियों की सुरक्षा को लेकर । बहुत सुंदर गजल बधाई आपको ।

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on September 15, 2013 at 6:44pm

सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई अरुणजी, आने वाली पीढ़ी को हमेशा चौकस रहना होगा।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 15, 2013 at 5:08pm

अरुण जी ....... ताजगी से भरी हुई ग़ज़ल ...आज के परिद्रश्य में बेटी का पिता होना वाकई चिंतित करने वाला है ...इस सुंदर रचना पर आपको हार्दिक बधाई .....

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