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बेशर्म लोगों की

बड़ी -बड़ी फ़ौज है

चोर हैं उचक्के हैं

लूट रहे मौज हैं

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थाने अदालत में

'चोर' बड़े दिखते  हैं

नेता के पैरों में

'बड़े' लोग गिरते हैं

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बूढा किसान साल-

बीस ! आ रगड़ता है

परसों तारीख पड़ी

कहते 'वो' मरता है

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बाप की पगड़ी में

'भीख' मांग फिरता है

'नीच' आज नीचे 'पी'

गिरता फिसलता है

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गधे और उल्लू का

बड़ा बोलबाला है

भक्त 'बड़े' चमचे हैं

जिनका मुंह काला है

-------------------------

नीति -रीति नियम -प्रीति

रोती हैं खोती हैं

विद्या व् लक्ष्मी भी

महलों जा रोती  हैं

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सूरज भी क्षीण हुआ

अँधियारा छाया है

राहु-केतु ग्रहण लगा

कौन बच पाया है ?

-----------------------------

सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर'५

1.30 P.M.-2.08 P.M.

कुल्लू हिमाचल

26.08.2013

Views: 819

Comment

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Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 16, 2013 at 11:53pm

प्रिय गिरिराज भाई रचना आज के हालात और व्यथा को दर्शा सकी आप ने सराहा आभार प्रोत्साहन हेतु
भ्रमर ५

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on September 16, 2013 at 11:51pm

सलीम जी अभिनंदन और आभार प्रोत्साहन हेतु
भ्रमर ५


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 16, 2013 at 5:21pm

आदरणीय सुरेन्द्र भाई , बहुत सटीक बातें लोखी है आपने , आग की स्थित् मे हर बन्द सही बैठ्ती है !! बहुत बधाई !!

Comment by saalim sheikh on September 16, 2013 at 2:01pm

''गधे और उल्लू का

बड़ा बोलबाला है

भक्त 'बड़े' चमचे हैं

जिनका मुंह काला है''

वाह! सुरेन्द्र कुमार शुक्ल 'भ्रमर' जी आपने बहुत सुंदर तरीके हकीक़त बयाँ की है
सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें

कृपया ध्यान दे...

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