212 212 212 212
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छांव में धूप का क्यों गुमाँ हो रहा
दर्द क्या इक नया फिर कोई बो रहा
सड़ चुकी मान्यता सांस फिर ले रही
दिन चढ़े तक कोई शख़्स ज्यों सो रहा
ज़ाहिरन बात ये कह रहा है करम
बढ़ गया पाप जब तो कोई धो रहा
हाल की शक्ल में फ़र्क़ कुछ तो रहे
कल गया बीत वो जो रहा सो रहा
पश्चिमी कुछ हवा सभ्यता खा रही
आदमी इसलिये आदमी खो रहा
तितलियाँ ख़ौफ़ से उड़ नही पा रहीं
वाक़िआ कुछ बुरा रोज़ ही हो रहा
रोशनी भी कहीं दिख रही है मगर
अब्र भी कुछ घना उस तरफ हो रहा
मौलिक एवँ अप्रकाशित
Comment
आदरणीय सौरभ भाई , गज़ल की सराहना के लिये और हौसला अफज़ाई के लिये आपका बहुत बहुत आभार !!!
सारे अशार एक ओर आखिरी शेर एक ओर.
बधाई स्वीकारें आदरणीय .. अंदाज़ भा गया .. वाह
आदरणीय वीनस भाई , आपका बहुत बहुत शुक्रिया , आपकी बात पूरी तरह समझ आ गई !! त्वरित समाधान के लिये आपको पुनः धन्यवाद !!
वुस्अत - विस्तार, सामर्थ्य
इस ग़ज़ल में रदीफ काफिया की बंदिश के कारण शाइर अपनी बात को कहने के लिए एक सीमित दायरे में बांध गया है फिर भी ग़ज़ल को बखूबी निभाया गया है
सादर
आदरणीय वीनस भाई , आपके हर शब्द मेरे लिये अमूल्य हैं , सराहना के लिये बहुत बहुत शुक्रिया !! आदरणीय गज़ल के लिहाज़ से वुसुअत धटाना किसे कहेंगे , अगर सम्भव हो तो ज़रूर बतायें , ताकि आगे से इसका भी खयाल रख सकें !! आपका बहुत बहुत शुक्रिया !!
आ दरणीय चन्द्र शेखर भाई , हौसला अफज़ाई के लिये शुक्रिया !!
आदरणीय बड़े भाई अखिलेश , गज़ल की सराहना के लिये आपका बहुत आभार !!
बढ़िया ग़ज़ल हुई है
रदीफ काफिया की बंदिश वुसअत को घटा रही है मगर आपने अपनी और से कोई कसर नहीं छोड़ी है
तहे दिल से दाद कुबूल फरमाएं
सुन्दर मुद्दे उठाती हूई ग़ज़ल के लिए बधाई आदरणीय
पश्चिमी कुछ हवा सभ्यता खा रही
आदमी इसलिये आदमी खो रहा .... ( इंसानियत खो रहा )
अच्छी गज़ल की बधाई ।
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