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जिंदगी तू ही बता जुस्तजू क्या है(ग़ज़ल ) 'राज'

2 1 2 2      2 1 2 2       2 1 2 2    2

"रमल मुसम्मन महजूफ"

.

जिंदगी तू ही बता दे जुस्तजू क्या है

इक निवाले के सिवा अब आर्ज़ू क्या है

 

ख़ास जोरोजर समझते हैं जहाँ  खालिस

या खुदा  उनके लिए इक  आबरू क्या है

 

नफ़रतों का जो जहर यूँ बारहा पीते

अम्न क्या है और उनकी  गुफ़्तगू  क्या है

 

फितरतें ताने जनी ही है सदा जिनकी

 बाद क्या उनकी नजर में रूबरू क्या है 

 

कीमते फ़न की नजर में ही नहीं जिनकी 

गीत या उनके लिए ऐ नज्म तू क्या है 

 

जो  नहीं  रखते अक़ीदत या अदब दिल में 

वो समझते ही नहीं यारब  गुरु क्या है

 

टीसते दिल से  टपकता तो  बहुत देखा

जो न टपका सरहदों पे वो लहू क्या है 

 

लाख सागर हैं यहाँ ऐ "राज" पीने को

पर जिसे लब छू न पायें वो  सबू क्या है

**********************************

जोर ओ जर =शक्ति और धन

 फ़न =कला

बारहा =हमेशा , अनेक बार ,बहुदा

ख़ालिस =केवल

सबू =मदिरा का मटका

सागर =पैमाने

अकीदत =श्रद्धा,आस्था

अदब =तहजीब 

 

(मौलिक एवं अप्रकाशित )

 

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 28, 2013 at 7:00pm

जी सादर :):):)


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 28, 2013 at 11:48am

//आपकी ये पंक्ति हतोत्साहित कर रही है शायद आपके पैमाने पर ये ग़ज़ल इतनी खरी नहीं उतरी चलो कोई बात नहीं ए या ऐ + लाने के लिए प्रयास रत रहूँगी//

नहीं जी ऐसी बात नहीं है .. इतनी चर्चा हो गयी है आपकी इस ग़ज़ल पर कि मेरे लिए कुछ खास कहना नहीं रहा है यह आशय है कहने का मेरे.

और मैं कितना विलम्ब से आया हूँ आपकी ग़ज़ल पर, यही तो दखिये !

सादर्


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 28, 2013 at 11:32am

आदरणीय सौरभ जी ---

बाकी सब ठीक ठाक ही गुज़रा है. यानी बी दिया है आपने आदरणीय आपकी ये पंक्ति हतोत्साहित कर रही है शायद आपके पैमाने पर ये ग़ज़ल इतनी खरी नहीं उतरी चलो कोई बात नहीं ए या ऐ + लाने के लिए प्रयास रत रहूँगी आपका हृदय से आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 28, 2013 at 11:26am

आदरणीय सलीम रजा जी आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रिया 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 27, 2013 at 10:44pm

बहुत बातें हुई हैं, खूब चर्चा हुई है इस ग़ज़ल पर ..

फिर भी गुरु  का रु ग़ाफ़ नहीं होगा, बोलने वाले यों गुरू (guroo) बोल जायें.

बाकी सब ठीक ठाक ही गुज़रा है.

उर्दू ग़ज़ल को यों भी देवनागरी लिपि मं पढ़ना अचकचाने कारण तो बनता ही है. जुस्तजू  और आरज़ू  ठीक आज और आवाज़ की तरह हैं जिनके हिन्दी ग़ज़ल में काफ़िया होने पर आपत्ति उठाने का एक स्कूल विरोध करता है.

Comment by SALIM RAZA REWA on September 27, 2013 at 9:34pm

लाख सागर हैं यहाँ ऐ "राज" पीने को

पर जिसे लब छू न पायें वो  सबू क्या है

बेहतरीन गजल, आदरणीया राजेश जी


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 27, 2013 at 5:54pm

प्रिय राम पाठक जी हार्दिक आभार आपका 

Comment by ram shiromani pathak on September 27, 2013 at 4:44pm

बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीया राजेश कुमारी जी //हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 27, 2013 at 10:03am

जीतेन्द्र गीत जी आपको ग़ज़ल पसंद आई तहे दिल से शुक्रिया इस उत्साह वर्धन के लिए 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 27, 2013 at 10:01am

आदरणीया वंदना जी हृदय तल से आभार आपका. 

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