इन मौन चट्टानों के सामने खड़ा
यह सोचता हूँ ,
कितनी कठोर हैं ये /
जितनी कठोर लगती हैं
क्या उतनी ही?
या कहीं ज्यादा ?
क्या भेद सकेगा कोई इनको?
और फिर मैं देखता हूँ
आकाश की ओर /
बदली छाई है ,
धूप का कतरा नहीं है ।
और फिर क्या देखता हूँ
तोड़ कर प्रस्तर कवच को ,
मोतियों सा झर रहा है ,
दुधिया झरना ।
भूल जाता हूँ मैं
कि
कितने कठोर हैं ये पाषाण खंड ,
कि
मैं इन्हें भेद नहीं सकूँगा ,
कि
बदली है / धुप का कतरा नहीं है ।
याद रह जाता है
मृदु हास्य करता
वो झरना / छलछलाता
वो शीतलता , तरलता
वो सिहरन / अपनापन
धूप सी खिल उठी है हर ओर ।
आज मैंने
इस तरह
महसूस किया है तुमको ।
मौलिक एवं अप्रकाशित
अरविन्द भटनागर 'शेखर'
Comment
बहुत भावपूर्ण रचना बधाई..
सृजन के क्रम में भावनाओं का असीमित उड़ान और फलस्वरूप एक खुबसूरत अतुकांत रचना का जन्म, वाह, अच्छी रचना लगी, बहुत बहुत बधाई आदरणीय भटनागर जी |
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