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ग़ज़ल - आज तू दर्द को ज़जा कहना । - पूनम शुक्ला

2122 1212 22
खत्म होती नहीं सजा कहना
बेरहम क्यों हुई रज़ा कहना

आशियाना सजा लिया हमने
तीरगी घेरती वज़ा कहना

आज फिर याद खूब आती है
मोतबर दर्द को मज़ा कहना

चाह कर भी सजा नहीं होगी
आज तू दर्द को ज़जा कहना

जान पर खेल कर कभी अपनी
जिन्दगी बाँटना क़जा़ कहना ।

दिन ब दिन बदलियाँ हटेंगी भी
जिन्दगी को न बेमज़ा कहना

कज़ा- ईश्वरीय आदेश
रज़ा - इच्छा
ज़जा - फल
मोतबर=जिसका एतबार किया हो,विश्वस्त

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by अरुन 'अनन्त' on October 10, 2013 at 6:03pm

आदरणीया पूनम जी वाह आपका ग़ज़ल पर ऐसा सुन्दर प्रयास देखकर प्रसन्नता हो रही है सभी अशआर पसंद आये कुछ शेर तनिक और कसे जा सकते थे, खैर दिली दाद कुबूल फरमाएं.

काफिया में कुछ संदेह हो रहा है .. सजा और रज़ा ( अधिक वीनस भाई जी कुछ कह पाएंगे हो सकता है यह मेरा मात्र एक भ्रम हो)


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Comment by गिरिराज भंडारी on October 10, 2013 at 3:19pm
आदरणीया पूनम जी , बहुत सुन्दर गज़ल कही आपने , आपको हार्दिक बधाई !!!!!!

कृपया ध्यान दे...

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