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ग़ज़ल - लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए

ख्वाब के मोती हकीकत में पिरोने के लिए।
लोग हैं तैयार खुद की लाश ढोने के लिए।

झोंपड़े में सो रहा मजदूर कितने चैन से,
है नहीं कुछ पास उसके क्योंकि खोने के लिए।

आसमां की वो खुली, लंबी उड़ानें छोड़कर,
क्यों तरसते हैं परिंदे कैद होने के लिए।

जिंदगी भर खून औरों का बहाते जो रहे,
जा रहे हैं तान सीना पाप धोने के लिए।

जगमगाते हैं दिखावे से शहर के सब मकान,
सादगी तो रह गई है मात्र कोने के लिए।

पुष्प सारे चल दिए रंगीन गमलों की तरफ,
रह गया उजड़ा चमन बदहाल रोने के लिए।

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 10, 2013 at 9:56am

हृदयतल से आपका आभार प्रिय मित्रवर अरुन शर्मा जी, आपका स्नेह सर-आँखोंपर...........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 10, 2013 at 9:55am

प्रोत्साहन हेतु बहुत-बहुत धन्यवाद आदरणीय सुशील जोशी जी.............

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 10, 2013 at 9:54am

आपका दिल से आभार आदरणीय बृजेश भैया..........

Comment by अरुन 'अनन्त' on November 9, 2013 at 5:41pm

आदरणीय प्रिय मित्रवर वाह मन प्रसन्न हो उठा बहुत ही शानदार ग़ज़ल कही है आपने सभी के सभी अशआर बहुत ही उम्दा बन पड़े हैं ढेरों दिली दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Sushil.Joshi on November 9, 2013 at 9:26am

शानदार गज़ल के लिए हार्दिक बधाई गौरव जी.....

Comment by बृजेश नीरज on November 6, 2013 at 9:45am

एक अच्छी ग़ज़ल के लिए आपको हार्दिक बधाई!

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2013 at 6:31pm

दिल से आभार आपका मित्र राम पाठक जी.........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2013 at 6:31pm

आदरणीय सौरभ सर, आपका स्नेह पाकर मेहनत सफल हुई, हार्दिक आभार..........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2013 at 6:29pm

प्रोत्साहन हेतु आपका हार्दिक आभार आदरणीय विजय जी..........

Comment by कुमार गौरव अजीतेन्दु on November 5, 2013 at 6:28pm

आदरणीय अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव जी, आपका बहुत-बहुत धन्यवाद........

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