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बताशा लगती हो तुम

बताशा लगती हो तुम

.

हिंदी के समान प्यारी, कोमल, सुरीली, मृदु,

घोले जो मिठास ऐसी भाषा लगती हो तुम,

जीवन में नीरसता, जैसे चहुँ ओर फैले,

तिमिर निराशाओं में आशा लगती हो तुम,

आँखें मूँद कर मृतप्राय हुए चित में यूँ,

सुंदर, सजग अभिलाषा लगती हो तुम,

नेह भरी देह का जो, रस पियूँ घोल-घोल,

चाशनी में डूबा सा बताशा लगती हो तुम।

----------------------------------- सुशील जोशी

“मौलिक व अप्रकाशित”

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Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 4:08am

हा..हा..हा...... आपके अनुमोदन से मन प्रसन्न हो गया आ0 सौरभ जी.... वैसे उर्दू और हिंदी तो बहनें ही हैं..... इसलिए उर्दू बोलने वालों के लिए इसमें संशोधन की उचित छूट दे देता हूँ कि वे हिंदी के स्थान पर उर्दू लिख सकें.... हा..हा....हा......

आपके सुझाव को भविष्य में अपनी रचनाओं पर अमल में लाने का संपूर्ण प्रयास रहेगा....

Comment by Sushil.Joshi on November 14, 2013 at 4:05am

बहुत बहुत धन्यवाद आ0 बृजेश जी.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 14, 2013 at 12:02am

जलहरण घनाक्षरी [३२ वर्णों का १६-१६ यति पर लघु लघु से पदांत] का इतना सुन्दर और व्यंग्यात्मक मिसाल दिया है आपने, आदरणीय !!

हृदय से बधाइयाँ स्वीकार कीजिये..

हिंदी के समान प्यारी, कोमल, सुरीली, मृदु,

घोले जो मिठास ऐसी भाषा लगती हो तुम.... . .. जिसकी ज़ुबां उर्दू की तरह .. यानि उर्दू पर मिट-मिट जाने वालों को बढिया उत्तर दिया है आपने .. हा हा हा हा हा.......

बारम्बार बधाई

सादर

एक बात:

छांदसिक रचनाओं को प्रस्तुत करने क्रम में छंदों के नाम और उनका संक्षिप्त विधान अवश्य दे दिया करे.

Comment by बृजेश नीरज on November 12, 2013 at 11:23pm

बहुत सुन्दर! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 7:36am

हा...हा..हा..... आ0 विजय जी....आपने सही कहा..... लेकिन इसी मिठास को तो बताने का प्रयास किया है मैंने यहाँ पर...... इतनी मीठी कि जैसे चाशनी में बताशा भी डाल दिया गया हो...... यानि डबल मीठी.... हा...हा..हा....... बहुत बहुत धन्यवाद आपकी टिप्पणी हेतु.....

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 7:31am

आपके अनुमोदन के लिए अतिश: धन्यवाद आ0 मीना जी....

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 7:30am

हा..हा...हा...... नेक सलाह एवं स्नेहिल टिप्पणी के लिए हार्दिक आभार आ0 राजेश कुमारी जी.....

Comment by Sushil.Joshi on November 12, 2013 at 7:29am

बहुत बहुत धन्यवाद आ0 राम भाई जी....

Comment by विजय मिश्र on November 11, 2013 at 5:52pm
सुशीलजी , बेशक एक सुंदर श्रींगारिक रचना ,मजेदार शब्द संयोजन मगर एक खटका है ,बतासा तो स्वेम चासनी का रवा है और अगर इसे चासने की कोशीश की तो फिर चासनी ही बन जाता है .भाव की दृष्टि से रचना बहुत सुंदर है .बधाई .
Comment by Meena Pathak on November 11, 2013 at 2:03pm

बहुत सुन्दर मीठी सी रचना :) बहुत बहुत बधाई | सादर 

कृपया ध्यान दे...

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