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गीत (रिश्ते नाते हारे)

गीत (रिश्ते नाते हारे)

गया सवेरा, ख़त्म दोपहर, ढली सुनहरी शाम,   

आँखें ताक रहीं शून्य, और मुँह में लगा विराम,

गीत, गज़ल ख़ामोश खड़े औ कविता हुई उदास,

जब सबने छोड़ा साथ,

आँसू की हुई बरसात।

 

मैंने भी अब मान लिया है जग की रीत पुरानी जी,

झूठ फले – फूले जीवन में, सच की हो कुर्बानी जी,

एक जिगर का टुकड़ा बनता फिर गर्दन की फाँस,

जब सबने छोड़ा साथ,

आँसू की हुई बरसात।

 

जीवन के इस बीच भँवर में ना डूबें, ना उतरें हम,

फूल नहीं थे, उनके दिल पर काँटे बन कर उभरे हम,

काँटे रक्षा करें फूल की, क्यों न उन्हें आभास,

जब सबने छोड़ा साथ,

आँसू की हुई बरसात।

 

शीत गई चंदा की अब तो, जल में अब अंगारे हैं,

चलन हुआ रुपयों का ऐसा, रिश्ते – नाते हारे हैं,

संग जानकी, राम भटकते, हुआ वही बनवास,

जब सबने छोड़ा साथ,

आँसू की हुई बरसात।

----------------------------------------- सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:24am

आशीर्वचनों के लिए आपका हार्दिक आभार आ0 विजय निकोरे जी....

Comment by vijay nikore on October 30, 2013 at 12:36pm

रिशतों की सच्चाई को बयां करती यह रचना भावपूर्ण है... आपको बधाई।

 

सादर,

विजय निकोर

 

 

Comment by Sushil.Joshi on October 30, 2013 at 7:24am

गीत के मर्म तक पहुँचकर अनुमोदन करने हेतु आपका कोटि कोटि धन्यवाद आ0 विजय जी.....

Comment by Sushil.Joshi on October 30, 2013 at 7:23am

बहुत बहुत धन्यवाद आपका आ0 राम भाई......

Comment by Sushil.Joshi on October 30, 2013 at 7:23am

ह्रदयतल से आभार आपका आ0 जितेन्द्र भाई जी....

Comment by Sushil.Joshi on October 30, 2013 at 7:22am

बहुत बहुत धन्यवाद रचना पसंद कर टिप्पणी देने के लिए आ0 राजेश जी...

Comment by विजय मिश्र on October 29, 2013 at 1:25pm
श्रध्येय सुशीलजी ,रोम-रोम से द्रवित करने वाली रचना है , एक ही बात कई तरह से कही जा सकती है मगर आपने जिस तरह से कहा है यह आत्म उद्बोधन से कम नहीं लगता , मर्म पर आघात करती है आपकी यह रचना , सोचने को बाध्य करती है ,परिस्थितियों की अनुभूति कराने में पूर्ण सक्षम है . आत्मीय अनुग्रह एवं आभार .धन्य .
Comment by ram shiromani pathak on October 29, 2013 at 11:31am

  आदरणीय शुशील  जी  , बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति  // बहुत बहुत बधाई///सादर 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on October 29, 2013 at 11:25am

आज के अपने अपने स्वार्थ, छल, कपट को पूर्णत: स्पष्ट करते सुंदर भाव से संजोयी गीत रचना पर, बधाई स्वीकारें आदरणीय शुशील जी

Comment by राजेश 'मृदु' on October 28, 2013 at 3:12pm

इस सुंदर रचना पर हार्दिक बधाई विशेषकर अंतिम चार पंक्तियों के लिए डबल बधाई, सादर

कृपया ध्यान दे...

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