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“इन्सपैक्टर साहब, मैं तो कहती हूँ कि हो न हो मेरे गहने मेरी सास ने ही चुराए हैं..... बहुत तिरछी नज़र से देखती थी उनको...... अब सैर के बहाने चंपत हो गई होगी उन्हें लेकर।“ – बड़े गुस्से में रौशनी ने कहा

वहीं रौशनी का पति दीपक चुपचाप खड़ा था।

इससे पहले की इन्सपैक्टर साहब कुछ कहते रौशनी की सास घर वापस लौटती दिखी। अपने घर पर भीड़ देखकर वे कुछ परेशान हुईं और कारण जानकर वे फिर से साधारण हो गईं जैसे कि वे चोर के बारे में जानती हों। अंदर अपने कमरे में जाकर वो दो कड़े और एक चेन लेकर वापस आईं और रौशनी को देते हुए बोलीं – बहू यह लो अपना सामान। कल तुमने इन्हें उतारकर ड्राइंग रूम में ही छोड़ दिया था। सुबह सैर को जाते समय मेरी नज़र इन पर पड़ी तो उठाकर अपनी अलमारी में संभाल कर रख दिया। तुम तो सो रही थीं ना। फिर एक नज़र उन्होंने दीपक पर डाली और फिर से अपने कमरे में चली गई।

दीपक अभी भी मौनव्रत खड़ा था।

.

 सुशील जोशी

"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:21am

आपकी सार्थक टिप्पणी के लिए कोटि कोटि धन्यवाद आपका आ0 सौरभ जी....

Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:20am

अतिश: धन्यवाद आपका आ0 शुभ्रांशु जी...

Comment by Sushil.Joshi on November 5, 2013 at 8:20am

आपके अनुमोदन के लिए हार्दिक धन्यवाद आपका आ0 डॉ. प्राची जी.....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 2, 2013 at 5:13am

पैसा बोलता है. बहू की वाणी में उसका ’लाया’ हुआ पैसा ही बोल रहा था जो बेटा दत्त-चित्त सुनता रहा. 

एक ऐसी कहानी जो बदलते नज़रिये की साक्षी है.

बधाई आदरणीय.

Comment by Shubhranshu Pandey on November 1, 2013 at 10:11am

आदरणीय सुशील जी, 

शंकाओं और धारणाओं को पिरो कर सुन्दर कथा बन पडी़ है. 

सादर.


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 30, 2013 at 12:44pm

दंग रह जाती हूँ देख कर कि परिवारों में ऐसा कुछ भी होता है...

आधुनिक पड़े लिखे परिवारों में अविश्वास और रिश्तों की सतहीयता का एक शर्मनाक किन्तु सत्य पक्ष प्रस्तुत करती संदेशपरक सार्थक लघुकथा पर हार्दिक बधाई आ० सुशील जोशी जी 

Comment by Sushil.Joshi on October 30, 2013 at 7:20am

आपकी अनमोल टिप्पणी के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद आ0 लक्ष्मण प्रसाद जी.....

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on October 28, 2013 at 12:24pm

नव वधु के ससुराल आने के बाद पति उसके आचरण, संस्कार को समझ, अपने घर के सुसंस्कार साझा करे,

साँस-बहु में सामंजस बिठाने का प्रयास करे तब तो सोने में सुहागा | परिपक्व सास ने स्थिति समभा घर की

लाज रखली,यही बड़ी बात है वरना लापरवाह बहु से तो ------------| कहानी में छुपे सुन्दर सन्देश के लिए हार्दिक बधाई भाई श्री शुशील जी  

Comment by Sushil.Joshi on October 28, 2013 at 4:56am

कथा के मर्म तक पहुँच कर उस पर अपनी अनमोल एवं उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद विशाल भाई....

Comment by VISHAAL CHARCHCHIT on October 27, 2013 at 1:35pm

वाह भाई.... आज के बदलते रिश्तों..... उनमें कम होते विश्वास पर आधारित एक बहुत ही रोचक एवं भावपूर्ण लघुकथा !!!

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