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सारथी, अब रुको

ये जुए खोल दो

बस इसी ठांव तक

था नाता तेरा

पथ यहां से अगम

विघ्‍न होंगे चरम

बस इसी गांव तक

था अहाता तेरा

कर्म तरणी सखे

पार ले चल मुझे

सत्‍य साथी मेरे

धर्म त्राता मेरा

होम होना नियम

टूटने दे भरम

नीर नीरव धरा

क्षीर दाता मेरा

जा तुझे है शपथ

कर न मुझको विपथ

फिर मिलूंगा तुझे

है वादा मेरा

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by राजेश 'मृदु' on December 2, 2013 at 5:17pm

आपका आभार अखिलेश जी, सादर

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on November 30, 2013 at 10:52pm

बधाई राजेश भाई इस सुंदर गीत के लिए ।

फिर मिलूंगा तुझे     ///       ....फिर मिलूंगा,  चाहे      

है वादा मेरा            ///          यदि विधाता मेरा  .... (या ऐसा ही कुछ ) इससे पूरे गीत में हिंदी शब्दों का प्रयोग हो जाएगा...  सादर ।

Comment by राजेश 'मृदु' on November 30, 2013 at 1:37pm

आपका हार्दिक आभार आदरणीय गीतिका जी

Comment by वेदिका on November 30, 2013 at 7:46am

वाह! उत्तम भावभिव्यक्ति के लिए हार्दिक बधाई !!

Comment by राजेश 'मृदु' on November 29, 2013 at 3:33pm

आदरणीय संदीप जी, आपने बताया तब ही मेरा भी ध्‍यान इस तुक की ओर गया, सादर

Comment by राजेश 'मृदु' on November 29, 2013 at 3:33pm

आप सबका हार्दिक आभार

Comment by annapurna bajpai on November 28, 2013 at 8:36pm

अति सुंदर , अद्भुत रचना बहुत बधाई आ0 राजेश मृदु जी । 

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on November 28, 2013 at 7:55pm

आदरणीय जय हो बहुत ही सुन्दर रचना रची है आपने

एक एक बंद भावों से भरा हुआ है ................किन्तु ये अंत में तुक में ता के स्थान पर दा क्यूँ लिया यह समझ नहींपाया 

Comment by बृजेश नीरज on November 28, 2013 at 7:23pm

वाह! अप्रतिम! और कुछ नहीं कहा जा सकता! आपको हार्दिक बधाई!

सादर!

Comment by राजेश 'मृदु' on November 28, 2013 at 3:56pm

आदरणीय जितेन्‍द्र 'गीत' जी आपका हार्दिक आभार

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