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ग़ज़ल-- जख़्म किसने दिया, बता दूं क्या?

जख़्म किसने दिया बता दूँ क्या ?

दिल में चाकू कहो  घुमा दूं क्या ?

हुक़्म पे तेरे चलता हूं आका ,

ये वफ़ादारियाँ  निभा  दूँ क्या  ?

देखता हूं जिसे मैं सपनों में,

उसकी तस्वीर भी दिखा दूँ क्या  ?

आपकी राजनीति कहती है 

बस्तियाँ आपकी जला दूं क्या  ?

अब किसी काम ही नहीं आता,

आग संविधान में लगा दूँ क्या?

       sube singh sujan

यह रचना मौलिक तथा अप्रकाशित है।

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Comment by सूबे सिंह सुजान on December 3, 2013 at 8:18pm

वीनस केसरी......ji bhai ji   आपकी बात सही पाी गई है।।धन्यवाद

Comment by वीनस केसरी on December 3, 2013 at 2:53am

आदरणीय अच्छी ग़ज़ल कही है

आख़िरी शेर पर फिर से गौर फरमा लें .. सानी बेबहर हो रहा है

Comment by सूबे सिंह सुजान on December 2, 2013 at 9:14pm

ajay sharma,  ji namskar........aapka aabhar ....honsla afzai ke liye danywad....

Comment by ajay sharma on December 1, 2013 at 11:34pm

bahut bahut khoob gazal kahi hai mahodaya

Comment by सूबे सिंह सुजान on December 1, 2013 at 8:48pm

अरुन शर्मा 'अनन्त',,,जी , आपका शुक्रिया

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 4:20pm

आदरणीय सूबे सिंह जी खूबसूरत अशआर हुए हैं बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने दो अशआरों में तकाबुले रदीफ़ का दोष है जाँच लें. इस सुन्दर ग़ज़ल हेतु बधाई स्वीकारें.

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 30, 2013 at 7:25pm

गिरिराज भंडारी,   जी नमस्कार....प्रतिक्रिया के लिये आपका आभार.

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 30, 2013 at 7:24pm

भाई आपका बेहद शुक्रिया दिल से,  बसंत नेमा जी.......प्रतिक्रिया के लिये आपका आभार..

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 30, 2013 at 7:22pm

जितेन्द्र 'गीत'जी नमस्कार  , आपकी तरफ से बधाई प्राप्त हुई  जो कि दिल से स्वीकार है। आपका धन्यवाद जो हमें इस लायक समझा।

Comment by सूबे सिंह सुजान on November 30, 2013 at 7:20pm

गीतिका 'वेदिका',बहर है     2 1 2 2 1 2 1 2 2 2 (112)  भी कर सकते हैं...सबसे प्रमुखता से प्रचलित बहर है। आपका आभार प्रतिक्रिया के लिये

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