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हाकिम निवाले देंगे

गाँव-नगर में हुई मुनादी

हाकिम आज निवाले देंगे

 

सूख गयी आशा की खेती

घर-आँगन अँधियारा बोती

छप्पर से भी फूस झर रहा

द्वार खड़ी कुतिया है रोती

 

जिन आँखों की ज्योति गई है

उनको आज दियाले देंगे

 

सर्द हवाएँ देह खँगालें

तपन सूर्य की माँस जारती

गुदड़ी में लिपटी रातें भी

इस मन को बस आह बाँटती

 

आस भरे पसरे हाथों को 

मस्जिद और शिवाले देंगे

 

चूल्हे हैं अब राख झाड़ते

बासन भी सब चमक रहे हैं

हरियाई सी एक लता है

फूल कहीं पर महक रहे हैं

 

मासूमों को पता नहीं है

वादे और हवाले देंगे

 

-        बृजेश नीरज

(मौलिक व अप्रकाशित) 

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Comment by बृजेश नीरज on December 2, 2013 at 8:28am

आदरणीय संदीप जी आपका हार्दिक आभार!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by sharadindu mukerji on December 2, 2013 at 3:57am

बृजेश जी......लाजवाब

Comment by sandhya singh on December 1, 2013 at 3:56pm

बहुत सुंदर गीत लिखा ब्रिजेश जी .... गाँव की बारीकियाँ उभर कर आयी हैं हर अंतरे में .....बहुत सुन्दर प्रवाह में उत्तम शिल्प में ढला गाँव की विडम्बना को दर्शाता एक सार्थक गीत ...बहुत बहुत साधुवाद आपको  ,,,

Comment by अरुन 'अनन्त' on December 1, 2013 at 1:46pm

आदरणीय बृजेश भाई जी क्या कहूँ शब्द नहीं हूँ मौन हो गया हूँ गीत की सुन्दरता कथ्य शिल्प और प्रवाह को देखकर, वास्तविकता को जिस सुन्दरता से शब्दों के रूप में बांधा और बयां किया है दिल लूट लिया भाई आपने. हृदयतल से ढेरो बधाई स्वीकारें

Comment by SANDEEP KUMAR PATEL on December 1, 2013 at 11:12am

क्या बात है बेहद खूबसूरत अंदाज में गीत रचा है आपने सीधे सीधे ह्रदय को बींधती है आपकी यह रचना

जय हो इस सच बयानी के लिए ह्रदय से बधाई

सादर

Comment by बृजेश नीरज on December 1, 2013 at 10:29am

आदरणीय शिज्जु जी बहुत शुक्रिया!

Comment by बृजेश नीरज on December 1, 2013 at 10:29am

आदरणीया गीतिका जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on December 1, 2013 at 10:28am

आदरणीय गिरिराज जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on December 1, 2013 at 10:27am

आदरणीय जितेन्द्र जी आपका हार्दिक आभार!

Comment by बृजेश नीरज on December 1, 2013 at 10:00am

आदरणीय नादिर साहब, बहुत बहुत आभार!

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