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साँसें लम्हों का क़र्ज़ मुझे बाँटती रहीं ......

साँसें लम्हों का क़र्ज़ मुझे बाँटती रहीं
ज़ख़्मों पे ख्वाहिशों के दर्द टाँकती रहीं

सोचा था कोशिशों को मिलेगी तो कहीं छाँव
क़िस्मत की मुठ्थियाँ ये जलन बाँटती रहीं

बच्चों की तरह बिल्कुल मिट्टी की स्लेट पर
हाथों की लकीरें भी वक़्त काटती रहीं

कहने को हम सफ़र थीं साँसें मेरी "अजय"
चलने को दो क़दम भी मगर हाँफती रहीं

सोया सफ़र में कितना , मैं जागा नहीं ख़बर
मेरी नींदें ख़्वाब में भी सफ़र नापती रहीं


मौलिक एवं अप्रकाशित
अजय कुमार शर्मा

Views: 395

Comment

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Comment by ram shiromani pathak on December 16, 2013 at 10:36pm

सुन्दर भावाभिव्यक्ति भाई जी हार्दिक बधाई आपको 

Comment by ajay sharma on December 15, 2013 at 10:33pm

thanks shijju ji , coontee ji,,,,,giriraj ji 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 15, 2013 at 9:39pm

आदरणीय अजय भाई , बहुत सुन्दर भाव , लाजवाब रचना के लिये आपको बधाई !!!!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on December 15, 2013 at 7:38pm

अच्छी रचना है

Comment by coontee mukerji on December 15, 2013 at 6:49pm

बहुत सुंदर बात कही है अजय जी, सादर

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