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हाथी हाथ से नहीं ठेला जाता (लघुकथा)

''मिश्रा जी, बेटी का बाप दुनिया का सबसे लाचार इंसान होता है. आपको कोई कमी नहीं, थोड़ी कृपा करें, मेरा उद्धार कर दें. बेटी सबकी होती है.' कहते-कहते दिवाकर जी रूआंसे हो गए । मिश्रा जी का दिल पसीज गया ।

अगले वर्ष घटक द्वार पर आए तो दिवाकर जी कह रहे थे

''अजी लड़के में क्‍या गुण नहीं है, सरकारी नौकर है. ठीक है हमें कुछ नहीं चाहिए, पर स्‍टेटस भी तो मेनटेन करना है. हाथी हाथ से थोड़े ना ठेला जाता है. चलिए 18 लाख में आपके लिए कनसिडर कर देते हैं और बरात का खर्चा-पानी दे दीजिएगा, और क्‍या. बेटी आपकी है जैसे चाहे संवारें या एक जोड़ी कपड़े में विदा कर दें.. हमें कोई आपत्ति नहीं ''

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

राजेश 'मृदु'

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on December 17, 2013 at 4:01pm

सुन्दर लघु कथा है आ० राजेश जी 

 

सादर शुभकामनाएं इस सुन्दर सार्थक प्रस्तुति पर 

Comment by vijay nikore on December 17, 2013 at 12:53pm

इस अच्छी लघु कथा के लिए आपको बधाई, आदरणीय राजेश जी।

Comment by umesh katara on December 17, 2013 at 11:08am

आज की बिडम्बना का सही चित्रण

Comment by वीनस केसरी on December 17, 2013 at 3:17am

सुन्दर लघुकथा है ...
शुरुआत में ज़रा सा स्पष्टता चाहिए

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on December 17, 2013 at 12:56am

न जाने यह स्वार्थ  किस रूप में अपने पांव पसारे हुए है, आजकल तो सीधे-सीधे पढाई का खर्चा भी माँगा जा रहा है, साथ में बहु कम पढ़ी लिखी, गाँव की  भी चलेगी ताकि घर में नोकरों की तरह काम करवा सकें, भाई !  दिवाकर जी ने ही तो बच्चे पालकर बड़े किये है, बाकि सबके बच्चो ने तो अवतार लिया है, बहुत बढ़िया लघुकथा आदरणीय राजेश जी, हार्दिक बधाई स्वीकारें

Comment by कल्पना रामानी on December 16, 2013 at 11:47pm

वाह वाह!! चित भी इनकी और पट भी इनकी...अफसोस कि युग बदलने के बाद भी कोई बदलाव नहीं आया

शब्दों  को सुंदरता से उकेरने के लिए आपको हार्दिक बधाई आदरणीय राजेश जी

Comment by ram shiromani pathak on December 16, 2013 at 11:09pm

इ तो लोलुपता कि पराकाष्ठा है  भाई जी, सुन्दर लघुकथा हार्दिक बधाई आपको। .........  सादर 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on December 16, 2013 at 7:27pm

कन्या के पिता  के रूप में घिघियाना और उसी व्यक्ति का वर के पिता के रूप में दहाड़ना आम बात है। इधर जितना हो सके बचाओ और मौका आने पर उधर से जितना हो सके कमाओ। राजेश भाई लघु कथा की बधाई ॥ 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 16, 2013 at 6:30pm

आदरणीय राजेश भाई , दहेज प्रथा पर बहुत सुन्दर लघु कथा कही है ॥ ये बीमारी खत्म नही हुई है , लेने का ढंग बदल गया है ॥ आपको बहुत बधाई ॥

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 16, 2013 at 5:54pm

मृदु जी

बहुत अच्छा कंसीडरेशन  है i आपको  शुभ कामनाये i

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