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2122 1122 22/112

आँधी से उजड़ा शजर लगता है

वो बुलन्द अब भी मगर लगता है

 

सिर्फ किरदार नये हैं उसके

इक पुराना वो समर लगता है

 

बेकरानी में कहीं गुम शायद

इक बियाबान में घर लगता है

 

वो कहीं शिद्दते- तूफ़ाँ तो नही

रास्ता छोड़ अगर लगता है

 

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो

तेरे हाथों में हुनर लगता है

 

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता है

 

आपके दम से जहीं है ये कलम

आपका दिल पे असर लगता है

समर = किस्सा या कहानी
बेकरानी = असीम विस्तार
जहीं(जहीन) = दक्ष

मुजस्सम = साकार

-मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 27, 2013 at 2:02pm

मित्र शिज्जू भाई

बेकरानी का शब्दार्थ मुझे नहीं पता i पर ग़ज़ल बेहतरीन है i उर्दू के कठिन अप्रचलित शब्दों का मायने बता देने से हम ग़ज़ल को और बेहतर समझ सकते थे i आपको बहुत बहुत बधाई हो i


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Comment by गिरिराज भंडारी on December 27, 2013 at 7:57am

आदरणीय शिज्जू भाई , बहुत शानदार गज़ल कही है , पूरी गज़ल , हर शेर क़ाबिले दाद हैं ॥एक मुकम्मल गज़ल के लिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by coontee mukerji on December 27, 2013 at 2:48am

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता है...........क्या बात है.

Comment by वीनस केसरी on December 27, 2013 at 12:46am

सुन्दर तरही ग़ज़ल कही है भाई जी हार्दिक आभार


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 11:15pm

जनाब नादिर भाई आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 11:15pm

आदरणीय गणेश जी आपका आभार
//वो2 बु1 लन्2 दब2 भी1 म1 गर2 लग2 ता2 है2// यहाँ मैंने अलिफ़ वस्ल का प्रयोग किया है

बेकरानी = व्यापकता या असीम विस्तार

माफ कीजियेगा शब्दों के अर्थ देना भूल गया

Comment by नादिर ख़ान on December 26, 2013 at 11:00pm

पत्थरों को जो मुजस्सम करे वो
तेरे हाथों में हुनर लगता है

काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर
बच के जाऊँ मुझे डर लगता है

आदरणीय शिज्जु जी ये दोनों शेर मुझे पसंद आए ... बहुत बधाई आपको 


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on December 26, 2013 at 10:50pm

//वो बुलन्द अब भी मगर लगता है//  मिसरा उलझा हुआ लग रहा है, एक बार पुनः विचार करें |

बेकरानी = ?

//काँच का दिल है ज़बाँ पे पत्थर

बच के जाऊँ मुझे डर लगता है// शेर बहुत ही सुन्दर हुआ है, झे =१ गिराकर पढ़ना मुश्किल लग रहा है |

बहुत बहुत बधाई इस प्रस्तुति पर |


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 10:49pm

भाई रामशिरोमणि जी आपका बहुत बहुत शुक्रिया


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Comment by शिज्जु "शकूर" on December 26, 2013 at 10:48pm

भाई रमेश जी आपका आभार

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