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स्वप्न और यथार्थ...

थाम के मैं हाथ तेरा चल पड़ी सपनों के नगर ..

एक अनजाना सा घर, एक  अनजानी डगर ..

ठान के ,हूँ साथ तेरे,कितना भी हो कठिन ये सफ़र..

पार भव कर ही लेंगे साथ मेरे तुम हो अगर..

 

छोड़ना मत हाथ मेरा तुम कभी वो हमसफ़र..

प्यार से सजाएंगे हम अपना ये प्रेम नगर..

करना नज़रंदाज़ मेरी गलती हो कोई अगर..

कोशिश तो बस ये मेरी, नेह में न हो कोई कसर..

आह! लेकिन ये क्या किया? क्यों तुमने मुझे त्याग दिया ?

चंद रुपयों के लिए मेरा आग से श्रृंगार किया ?

भूल चले प्रण सभी जो सात फेरों संग किया ?

वो सभी वादे क्या हुए प्रीत में मुझसे था किया ?

 

जा रही हूँ ,जाओ तुम्हे माफ़ किया ..

अब मैंने तुम्हे क्या, सभी कुछ त्याग दिया ..

जी लो अपनी तरह, मैंने तुम्हे मुक्त किया ..

वो संवेदन हीन पशु , जाओ तुम्हे मुक्त किया ..


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Comment by Lata R.Ojha on February 9, 2011 at 10:02am
धन्यवाद राकेश जी
Comment by Lata R.Ojha on February 2, 2011 at 5:57pm
धन्यवाद अजय कुमार सिंह जी :)
Comment by Lata R.Ojha on January 31, 2011 at 8:58pm
धन्यवाद आशीष यादव जी,,आर.एन.तिवारी जी  और नवीन जी  ..
Comment by R N Tiwari on January 31, 2011 at 10:13am
विकृत समाज के बीभत्स रूप का दर्शन कराती एक मर्मस्पर्शी रचना.  बहूत बहूत धन्यवाद.
- आर .  एन .तिवारी
Comment by आशीष यादव on January 31, 2011 at 7:53am
बहुत मार्मिक एवं सत्य रचना| ह्रदय स्पर्शी|
Comment by Lata R.Ojha on January 30, 2011 at 11:19pm
धन्यवाद गणेश भाई और अरुण कुमार पांडे जी .सच में ये समाज का घिनौना सच है जो हर नवयुवती के मन में डर बन के रहता है.
Comment by Abhinav Arun on January 30, 2011 at 10:33pm
दिल को छू लेने वाली रचना ! बहुत मर्मस्पर्शी !!!

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on January 30, 2011 at 8:33pm
लता जी, क्या कहे इस पोस्ट पर, बहुत ही मार्मिक रचना है, समाज का एक घिनौना रूप दिखाती यह रचना सभ्य समाज पर झन्नाटेदार तमाचा है | एक सवाल यह पैदा होता है कि क्या हम सच मे सभ्य हो गये है, एक तरफ तो प्राण से भी ज्यादा प्यार करने वाली जीवन साथी और दुसरे तरफ चंद रुपये के खातिर किसी का जीवन छीन लेना क्या यही सभ्य समाज है | सब मिलाकर एक बेहतरीन रचना | बहुत बहुत बधाई लता जी इस बेहतरीन अभिव्यक्ति हेतु |

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