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जाने कब तक (नवगीत)

जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
साँस के तार 
जब तक जुड़े है 
देह की ये 
पतंगे उड़े है 
 
है महज-
उँगलियों का इशारा   … 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
हमने देखा है 
अपना रवैया 
काम हो तो 
करें दादा-भैया 
 
ढंग जायज़ 
नहीं ये हमारा    .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
ये व्यवस्था का 
जोड़ो-घटाना 
गुणा -भाग का 
है तराना  
 
इसके आगे 
नहीं कोई चारा   .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
कर्म अच्छे 
अगर हम करेंगे 
बाद अपने भी 
जिन्दा रहेंगे 
 
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
.
(अप्रकाशित-मौलिक रचना )
अविनाश बागड़े 

Views: 739

Comment

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Comment by AVINASH S BAGDE on January 24, 2014 at 2:10pm
 
आभार  भाई  ram shiromani pathakजी 
Comment by AVINASH S BAGDE on January 24, 2014 at 2:09pm
ह्रदय से आभार आदरणीय सौरभ जी 

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 14, 2014 at 11:18pm

जमा मगर खूब नहीं .. प्लीज ..

आपसे बहुत अच्छी की उम्मीद बन जाती है अब.

सादर

Comment by ram shiromani pathak on January 14, 2014 at 9:38pm

बहुत ही प्यार नवगीत आदरणीय अविनाश  जी। । हार्दिक बधाई आपको 

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:07am

बृजेश नीरज  जी बहुत बहुत आभार आपका  

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:07am

Sarita Bhatia ji...आभार आपका   !

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:06am

भाई arun kumar nigam  जी बहुत बहुत आभार आपका   

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:05am

आभारी हूँ  आदरणीया  coontee mukerji जी

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:04am

शुक्रिया आपकी हौसला अफ़ज़ाई काvandana mam

Comment by AVINASH S BAGDE on January 13, 2014 at 12:03am

कल्पना रामानी jiमेरी रचना को इस तरह से आपने सम्मान दिया /आभारी हूँ 

कृपया ध्यान दे...

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