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जाने कब तक (नवगीत)

जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
साँस के तार 
जब तक जुड़े है 
देह की ये 
पतंगे उड़े है 
 
है महज-
उँगलियों का इशारा   … 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
हमने देखा है 
अपना रवैया 
काम हो तो 
करें दादा-भैया 
 
ढंग जायज़ 
नहीं ये हमारा    .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
ये व्यवस्था का 
जोड़ो-घटाना 
गुणा -भाग का 
है तराना  
 
इसके आगे 
नहीं कोई चारा   .... 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
 
कर्म अच्छे 
अगर हम करेंगे 
बाद अपने भी 
जिन्दा रहेंगे 
 
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा 
.
(अप्रकाशित-मौलिक रचना )
अविनाश बागड़े 

Views: 728

Comment

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Comment by बृजेश नीरज on January 10, 2014 at 10:03pm

अच्छी प्रस्तुति है! आपको हार्दिक बधाई!

Comment by Sarita Bhatia on January 10, 2014 at 4:38pm

सुन्दर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by अरुण कुमार निगम on January 10, 2014 at 9:23am

सुन्दर नवगीत के लिए बधाइयाँ........................

Comment by vandana on January 10, 2014 at 7:38am
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा
बहुत सुन्दर रचना आदरणीय 
Comment by coontee mukerji on January 10, 2014 at 1:44am

सुदर प्रस्तुति....हार्दिक बधाई.

Comment by कल्पना रामानी on January 9, 2014 at 10:24pm
रखें  पाक  
सत्संग की धारा 
जाने कब तक 
चले खेल सारा...
आदरणीय अविनाश जी  सुंदर भावपूर्ण संदेश आपका। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिये 
Comment by AVINASH S BAGDE on January 9, 2014 at 10:22pm

आदरणीया शशि पुरवार मैम ,शुक्रिया आपकी हौसला अफ़ज़ाई का 

Comment by AVINASH S BAGDE on January 9, 2014 at 10:21pm

आदरणीय S. C. Brahmachari सर ,मेरी रचना को इस तरह से आपने सम्मान दिया /आभारी हूँ 

Comment by AVINASH S BAGDE on January 9, 2014 at 10:19pm

भाई जितेन्द्र गीत जी बहुत बहुत आभार आपका   

Comment by AVINASH S BAGDE on January 9, 2014 at 10:18pm

आभारी हूँ  आदरणीया अनुपमा  जी

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