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ग़ज़ल : - बनारस के घाट पर

ग़ज़ल : - बनारस के घाट पर

 

कुछ था ज़रूर खास बनारस के घाट पर ,

धुंधला दिखा लिबास बनारस के घाट पर |

 

घर था हज़ार कोस मगर फ़िक्र साथ थी ,

मन हो गया उदास बनारस के घाट पर |

 

संज्ञा क्रिया की संधि में विचलित हुआ ये मन

गढ़ने लगा समास बनारस के घाट पर |

 

दुनिया के रंग देख कर हर रोज ही कबीर ,

करता है अट्टहास बनारस के घाट पर |

 

बदरंग हुआ जल तमाम मछलियाँ मरीं ,

किसका हुआ निवास बनारस के घाट पर |

 

फिर आओ भगीरथ नयी सी गंगा बुलाओ ,

गाता है रविदास बनारस के घाट पर |

 

जमने लगी है आरती उत्सव भी हो रहे ,

फिर से जगी है आस बनारस के घाट पर |

 

काशी को बम का खौफ अमाँ भूल जाईये ,

मत बोइये खटास बनारस के घाट पर |

 

दीना की चाट  खूब तो अख्तर की मलइयो ,

रिश्तों में है मिठास बनारस के घाट पर |

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on April 29, 2011 at 7:17pm
आभार नेमीचन्द्र जी आपकी तारीफ हौसला और ऊर्जा देती है |
Comment by nemichandpuniyachandan on April 27, 2011 at 5:07pm
Shree Arun kumar pandey sahab,phir aao bhagirath nai si ganga bulao,gataa hai ravidas banaras ke ghat par.vaah ye sheir to dil me utar gaya.bakee poori ghazal ke sheir ek se badkar ek hai,badhai
Comment by Abhinav Arun on February 15, 2011 at 2:08pm
बटन से कुछ सक्रियता बढ़ी है ...अच्छा हुआ ..शुक्रिया साथियों |
Comment by Abhinav Arun on February 9, 2011 at 7:30am
आभार राकेश जी , आपके शब्द मुझे बल देंगे बेहतर लिखने के लिये |
Comment by Abhinav Arun on February 6, 2011 at 10:53am
आभारी हूँ आशीष जी आपके प्रोत्साहन के लिये \
Comment by आशीष यादव on February 6, 2011 at 10:42am
फिर से एक उम्दा ग़ज़ल की प्रस्तुति| इस मंच पे तो सुना नहीं पढ़ा ही जाता है और मै जब पढ़ रहा हूँ आप की ग़ज़लों की बात बहुत ही अनोखी होती होती है|
Comment by Abhinav Arun on February 4, 2011 at 1:07pm
शुक्रिया बागी जी \गज़ल आपको भाई मैं आभारी हूँ |

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on February 2, 2011 at 7:39pm
बहुत बढ़िया अरुण जी, आपने तो घर बैठे ही काशी की खूबसूरती दिखा दिया | बेहद खुबसूरत ग़ज़ल | दाद कुबूल करे |
Comment by Abhinav Arun on February 2, 2011 at 2:03pm

आदरणीया रंजना जी , सर्वश्री प्रभात जी ,सुजीत जी ,तिलक राज जी आप सब ने मेरी गज़ल को सराहा आभारी हूँ मेरा लिखना सार्थक हुआ | शुक्रिया |

Comment by prabhat kumar roy on February 2, 2011 at 7:22am
A vary good GAZAL by poet ABHINEV . I like it.

दुनिया के रंग देख कर हर रोज ही कबीर ,

करता है अट्टहास बनारस के घाट पर |

Wonderful lines.

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