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तुम क्या जानो जी तुमको हम 
कितना 'मिस' करते हैं...

तुम्हे भुलाना खुद को भूल जाना है 
सुन तो लो, ये नही एक बहाना है 
ख़ट-पद करके पास तुम्हारे आना है 
इसके सिवा कहाँ कोई ठिकाना है...

इक छोटी सी 'लेकिन' है जो बिना बताये 
घुस-बैठी, गुपचुप से, जबरन बीच हमारे 
बहुत सताया इस 'लेकिन' ने तुम क्या जानो 
लगता नही कि इस डायन से पीछा छूटे...

चलो मान भी जाओ, आओ, समझो पीड़ा मेरी 
अपने दुःख-दर्दों के मिलजुल गीत बनाएं 
सुख-दुःख के मलहम का ऐसा लेप लगाएं 
कि उस 'लेकिन' की पीड़ा से मुक्ति पायें...
----------------अ न व र सु है ल -----------

(मौलिक अप्रकाशित)

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Comment by रमेश कुमार चौहान on January 17, 2014 at 8:37pm

भावपूर्ण इस रचना के लिये बधाई आदरणीय सुहैलजी


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 16, 2014 at 11:33pm

आपके कहने का अंदाज़ बदला हुआ सा लग रहा है. यह भी सही.

बढिया है.

सादर

Comment by coontee mukerji on January 16, 2014 at 10:13pm

चलो मान भी जाओ, आओ, समझो पीड़ा मेरी 
अपने दुःख-दर्दों के मिलजुल गीत बनाएं 
सुख-दुःख के मलहम का ऐसा लेप लगाएं 
कि उस 'लेकिन' की पीड़ा से मुक्ति पायें.......बहुत सुंदर..बधाई अनवर जी.

Comment by annapurna bajpai on January 16, 2014 at 6:40pm

वाह !! बहुत सुंदर रचना हेतु  बहुत बधाई स्वीकारें आ0 सुहैल जी । 

Comment by Meena Pathak on January 16, 2014 at 2:42pm

चलो मान भी जाओ, आओ, समझो पीड़ा मेरी 
अपने दुःख-दर्दों के मिलजुल गीत बनाएं 
सुख-दुःख के मलहम का ऐसा लेप लगाएं 
कि उस 'लेकिन' की पीड़ा से मुक्ति पायें....................... बहुत सुन्दर आ० अनवर जी | बधाई 

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