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रमेश कुमार चौहान
  • Male
  • chhatisgarh
  • India
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रमेश कुमार चौहान added a discussion to the group आंचलिक साहित्य
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दाई के गोरस सही, धरती के पानी (छत्तीसगढ़ी)

//उपमान छंद//(छंद विधान-चार चरण 13,10 मा यति, अंत मा दू गुरू)दाई के गोरस सही, धरती के पानी ।दाई ले बड़का हवय, धरती हा दानी ।।सहत हवय दूनो मनन, तोरे मनमानी ।रख गोरस के लाज ला, कर मत नादानी ।।होगे छेदाछेद अब, धरती के छाती ।कइसे बरही तेल बिन, जीवन के बाती ।।परत हवय गोहार सुन, अंतस मा तोरे ।पानी ला खोजत हवस, गाँव-गली खोरे ।।रहिही जब जल स्रोत हा, रहिही तब पानी ।तरिया नरवा बावली, नदिया बरदानी ।।पइसा के का टेस हे, पइसा ला पीबे ।पइसा मा मिलही नही, तब कइसे जीबे…See More
Jun 1, 2018
रमेश कुमार चौहान shared their discussion on Facebook
May 31, 2018
रमेश कुमार चौहान added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
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जपत रटत राम नाम, तरना है दुनिया

(छंद-उड़ियाना पद, विधान- उड़ियाना-12, 10 अंत में एक गुरू, उड़ियाना पद 12,12,12,10 अंत में एक गुरू)जपत रटत राम नाम, तरना है दुनियाजपत रटत राम नाम, तरना है दुनियाकर्म करत एक घ्येय, एक लक्ष्य एक गेह,भक्ति शक्ति मान रखे, भक्त बड़ा गुनिया ।।स्वार्थ मोह राग द्वेष, जगत देह भरे क्लेश,तजे द्वन्द देह मान, तजे मन मलनिया ।।अंत काल साथ नहीं, जिसे कहे यही सहीं,एक राम साथ रहे, बाकी चरदिनिया ।।राम चरण ‘रमेश‘ धर, कहे बात विनती कर,राम नाम मन में भर, आत्म देह ऋणिया…See More
May 31, 2018
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 80 in the group चित्र से काव्य तक
"//सरसी छंद// सोच रहा वह बालक नन्हा, उँगली मुँख पर दाब ।आँखों में तो झलक रहा है, इक छोटा सा ख्वाब ।।टूटा-फूटा घर है मेरा, निर्धनता पहचान ।पढ़-लिख कर पाना है मुझको, धन दौलत सम्मान ।। पास रखा लोटा पर पानी, करता उससे बात ।पहले अपना मुँह तो धो लो, विगत…"
Dec 15, 2017
सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' commented on रमेश कुमार चौहान's blog post पहनावा (कुण्डलियां)
"आद0 रमेश चौहान जी सादर अभिवादन। कुण्डलिया पर बधाई हाजिर है। आद0 समर साहब और रामबली जी के बातों पर गौर कीजियेगा। सादर"
Oct 25, 2017
रामबली गुप्ता commented on रमेश कुमार चौहान's blog post पहनावा (कुण्डलियां)
"न केवल कथ्य बल्कि शिल्प में भी काफी गुंजाइश है। स्वरितत्व=? देह का लज्जा के स्थान पर देह की लज्जा होना चाहिए। रोले के अंतिम चरण में 13 के स्थान पर 15 मात्राएँ हैं। प्रयास के लिए सादर बधाई स्वीकारें"
Oct 25, 2017
Mohammed Arif commented on रमेश कुमार चौहान's blog post पहनावा (कुण्डलियां)
"आदरणीय रमेश जी आदाब, परिधान को परिभाषित करती बेहतरीन कुंडलिया छंद की रचना की है । हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।आली जनाब मोहतरम समर कबीर साहब की इस्लाह पर ग़ौर करें ।"
Oct 24, 2017
Samar kabeer commented on रमेश कुमार चौहान's blog post पहनावा (कुण्डलियां)
"जनाब रमेश कुमार चौहान साहिब आदाब,बहुत बढ़िया कुण्डलिया छन्द लिखा आपने,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें । 'पहनावा ही बोलता' के स्थान पर "पहनावे से बोलता" करना क्या उचित होगा ?"
Oct 24, 2017
रमेश कुमार चौहान posted a blog post

पहनावा (कुण्डलियां)

पहनावा ही बोलता, लोगों का व्यक्तित्व ।वस्त्रों के हर तंतु में, है वैचारिक स्वरितत्व ।।है वैचारिक स्वरितत्व, भेद मन का जो खोले ।नग्न रहे जब सोच, देह का लज्जा बोले ।फैशन का यह फेर, नग्नता का है लावा । आजादी के नाम, युवा पहने जो पहनावा ।।.............................................मौलिक एवं अप्रकाशितSee More
Oct 24, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओबीओ चित्र से काव्य तक छंदोत्सव" अंक- 78 in the group चित्र से काव्य तक
"सरसी छंद कम्प्यूटर पर दीपक गढ़कर, मना रही वह पर्व ।मित्रों को संदेश भेज कर, अनुभव करती गर्व ।। नया जमाना नया दौर है, जिसका मूल विज्ञान ।परम्परा को तौल रहे हैं, लेकर नवीन ज्ञान ।। यंत्र तंत्र में जीवन सिमटा, जिसका नाम विकास ।सोशल मिडिया से बंधा है,…"
Oct 21, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"हार्दिक आभार, मान्यवर"
Oct 14, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आदरणीय श्रीवास्तजी, आपका सुझाव स्वागतेय है, सादर आभार"
Oct 14, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"आपके अवलोकन हेतु सादर आभार"
Oct 14, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"जी छांदिक विधान देना भूल गया हूॅ, आगे इस बात का ध्यान रखूंगा, सादर धन्यवाद"
Oct 14, 2017
रमेश कुमार चौहान added a discussion to the group धार्मिक साहित्य
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गोपी गीत

गोपी गीत(हरिगीतिका छंद)हे ब्रज लला ब्रज धाम को, बैकुण्ड़ सम पावन किये ।ले जन्म इस ब्रज धाम में, सुंदर चरित हैं जो किये जय देवकी वसुदेव सुत, जय नंद लाला यशुधरे । कर जोर कर सब गोपिया,ं प्रभु आपसे विनती करे ।।1।।हे श्याम तुम जब से लिये हो जन्म इस ब्रज धाम में ।महिमा बढ़ी इसकी तभी, बैकुण्ड़ सम सब धाम में ।।मृदुली रमा तब से यहां, करती सदा ही वास है ।प्र्रभु आपके कारण बनी, ब्रज भूमि तो अब न्यास है ।।2।।पर देखलो प्रियतम प्र्रिये, तुहरी सभी हम गोपियां ।निज प्र्राण को तेरे चरण, अर्पित किये हैं गोपियां ।।…See More
Oct 14, 2017
रमेश कुमार चौहान replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव महा उत्सव" अंक-84
"/त्रिभंगी छंद/ जागृत परमात्मा, जग की आत्मा, ज्योति रूप में, रचे बसे ।अंतरिक्ष शासक, निश्श विनाशक, दिनकर भास्कर, कहे जिसे ।।अविचल पथ गामी, आभा स्वामी, जीवन लक्षण, नित्य रचे ।जग जीवन दाता, सृष्टि विधाता, गतिवत शाश्वत, सूर्य जचे ।। विज्ञानी कहते, सूरज…"
Oct 13, 2017

Profile Information

Gender
Male
City State
Nawagarh C.G.
Native Place
Nawagarh
Profession
teacher
About me
छत्तीसगढ़ी एवं हिन्दी में कविता पढ़ना पसंद हैं । कुछ पंक्तियां स्वयं का लिखने का प्रयास रहता है ।

रमेश कुमार चौहान's Blog

पहनावा (कुण्डलियां)

पहनावा ही बोलता, लोगों का व्यक्तित्व ।
वस्त्रों के हर तंतु में, है वैचारिक स्वरितत्व ।।
है वैचारिक स्वरितत्व, भेद मन का जो खोले ।
नग्न रहे जब सोच, देह का लज्जा बोले ।
फैशन का यह फेर, नग्नता का है लावा ।
आजादी के नाम, युवा पहने जो पहनावा ।।
.............................................
मौलिक एवं अप्रकाशित

Posted on October 23, 2017 at 11:08pm — 4 Comments

यथावत रखें संसार (नवगीत)

एक-दूजे के पूरक होकर

यथावत रखें संसार

पक्ष-विपक्ष राजनीति में

जनता के प्रतिनिधि

प्रतिवाद छोड़ सोचे जरा

एक राष्ट्र हो किस विधि

अपने पूँछ को शीश कहते

दिखाते क्यों चमत्कार

हरे रंग का तोता रहता

जिसका लाल रंग का चोंच

एक कहता बात सत्य है

दूजा लेता खरोच

सत्य को ओढ़ाते कफन

संसद के पहरेदार

सागर से भी चौड़े हो गये

सत्ता के गोताखोर

चारदीवारी के पहरेदार ही

निकले कुंदन…

Continue

Posted on February 23, 2017 at 6:00pm — 3 Comments

राजनीति (नवगीत)

घुला हुआ है

वायु में,

मीठा-सा  विष गंध



जहां रात-दिन धू-धू जलते,

राजनीति के चूल्हे

बाराती को ढूंढ रहे  हैं,

घूम-घूम कर दूल्हे



बाँह पसारे

स्वार्थ के

करने को अनुबंध



भेड़-बकरे करते जिनके,

माथ झुका कर पहुँनाई

बोटी-बोटी करने वह तो

सुना रहा शहनाई



मिथ्या-मिथ्या

प्रेम से

बांध रखे इक बंध



हिम सम उनके सारे वादे

हाथ रखे सब पानी

चेरी, चेरी ही रह जाती

गढ़कर राजा-रानी



हाथ… Continue

Posted on November 4, 2016 at 2:57pm — 3 Comments

चवपैया छंद

(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

Posted on September 25, 2016 at 7:30am — 2 Comments

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At 10:28pm on November 24, 2013, डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव said…

चौहान जी

हम सब यहाँ सीखते है i हो सकता है कल मै आप से कुछ पा सकू  i आभार i

At 8:47pm on September 5, 2013, mrs manjari pandey said…

      

      आदरणीय चौहाण जी हार्दिक आभार .

At 9:33pm on August 24, 2013, बृजेश नीरज said…

ओबीओ पर आपका हार्दिक स्वागत है!

 
 
 

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