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(चवपैया छंद-10, 8, 12 मात्रा के तीन -तीन चरणों के कुल चार पद , प्रत्येक पद के प्रथम एवं द्वितीय चरण मं समतुक एवं दो-दो पद में 1122 मात्रा या पदांत 2 मात्रा के के साथ समतुक पर हो)

हे आदि भवानी, जग कल्याणी, जन मन के हितकारी ।
माँ तेरी ममता, सब पर समता, जन मन को अति प्यारी ।।
हे पाप नाशनी, दुख विनाशनी, जग से पीर हरो माँ ।
आतंकी दानव, है क्यों मानव, जन-मन विमल करो माँ ।।

...................................

मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 26, 2016 at 4:14pm

आ. रमेश चौहान जी बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए, आ.  डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव सर की बात का संज्ञान लीजिएगा

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on September 25, 2016 at 7:24pm

aa0  आपे चार चरणों में तीन में जन-मन दुहराया गया है . इससे बचना चाहिए था मित्र . आपका मात्रा   निर्वाह सही है , सादर .

कृपया ध्यान दे...

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