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उत्तर खोजो श्रीमान जी...

एकदम से ये नए प्रश्न हैं
जिज्ञासा हममें है इतनी
बिन पूछे न रह सकते हैं
बिन जाने न सो सकते हैं
इसीलिए टालो न हमको
उत्तर खोजो श्रीमान जी....

ऐसे क्यों घूरा करते हो
हमने प्रश्न ही तो पूछा है
पास तुम्हारे पोथी-पतरा
और ढेर सारे बिदवान
उत्तर खोजो ओ श्रीमान...

माना ऐसे प्रश्न कभी भी
पूछे नही जाते यकीनन
लेकिन ये हैं ऐसी पीढ़ी
जो न माने बात पुरानी
खुद में भी करती है शंका
फिर तुमको काहे छोड़ेगी
उत्तर तुमको देना होगा..
मौन तोडिये श्रीमान जी.....
----------------अ न व र सु है ल ---------

(मौलिक अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on January 30, 2014 at 5:00pm

ये क्या पूछती कविता है ? वैसे प्रयोगात्मक स्वरूप में तथ्यात्मकता की गुंजाइश रहती है

सादर


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on January 24, 2014 at 12:14pm

ऐसे बिना पूछे गए प्रश्नों के उत्तर भी बिना शब्दों के ही होते हैं... :)) शायद! ...जो बिना कहे ही मिल जाते हैं अनायास शायद आँखों में.

फिर भी कुछ अनुत्तरित बातें सदा ही बैचानी का कारण बनी रहती हैं. इसलिए प्रश्नों का उत्तरित होना भी ज़रूरी ही होता है.

एक अलग सी प्रस्तुति लगी.. कुछ अधूरी सी भी.

शुभकामनाएं 

Comment by annapurna bajpai on January 23, 2014 at 12:32am

आ0 अनवर जी कुछ अलग संदेश सुनाती हुई रचना के लिए बधाई ।  


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on January 22, 2014 at 7:05pm

बहुत बढ़िया आदरणीय अनवर सर

Comment by अरुन 'अनन्त' on January 22, 2014 at 3:23pm

आदरणीय अनवर साहब बहुत अच्छी रचना कुछ अलग बयानी की है  बधाई आपको

कृपया ध्यान दे...

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