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बह्र : २१२ २१२ २१२

जब उड़ी नोच डाली गई
ओढ़नी नोच डाली गई

एक भौंरे को हाँ कह दिया
पंखुड़ी नोच डाली गई

रीझ उठी नाचते मोर पे
मोरनी नोच डाली गई

खूब उड़ी आसमाँ में पतंग
जब कटी नोच डाली गई

देव मानव के चिर द्वंद्व में
उर्वशी नोच डाली गई
------------
(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 10:03pm

बहुत बहुत शुक्रिया गिरिराज भंडारी जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 10:02pm

बहुत बहुत शुक्रिया अरुन शर्मा 'अनन्त' जी। कठिन रदीफ़ केवल एक प्रयोग के तौर पर ले रहा हूँ। आपको ऐसा लगता है कि ठीक से निभा पा रहा हूँ तो इसके लिये तह-ए-दिल से शुक्रिया

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:58pm

बहुत बहुत धन्यवाद Arun Srivastava जी। कृपादृष्टि बनी रहे

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:57pm

आभारी हूँ Sarita Bhatia जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:57pm

बहुत बहुत धन्यवाद बृजेश नीरज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:56pm

तह-ए-दिल से शुक्रगुज़ार हूँ आदरणीय तिलक राज जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:55pm

बहुत बहुत शुक्रिया Dr.Prachi Singh जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:54pm

बहुत बहुत धन्यवाद Baidyanath Saarthi जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on January 30, 2014 at 9:54pm

बहुत बहुत शुक्रिया  MUKESH SRIVASTAVA जी

Comment by MUKESH SRIVASTAVA on January 28, 2014 at 3:32pm

ooooooooooofffffffff  - kaafile taareef

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