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कह-मुकरियाँ - कल्पना मिश्रा बाजपेई

1-)

छू जाता  है तन को मेरे। 

कह जाता  है मन को मेरे ।

उसको हरदम है कुछ कहना,

क्या सखि साजन ?

ना सखि नैना !

2-)

छूते है तन मन को मेरे ।

बिन बोले ही मेरे तेरे ।

मिल जाते हम सब के संग,

क्या सखि साजन ?

ना सखि रंग !

3-)

दिल को मेरे छू जाती है ।

भावनाओं को सहलातीं है ।

इन की नहीं है कोई म्यादे ,

क्या फरियादें ?

ना सखि यादें !

4-)

टिकट बिना भाग ये जाता ।

कोई वाहन इसे ना भाता ।

इसका नहीं है कोई तन ,

क्या सखि वेतन ?

ना सखि मन !

5-)

बिन तेरे कुछ मुझे न भाता ।

तू ही मेरा भाग्य विधाता ।

तुझ में रहती हर दम मगन,

क्या सखि साजन ?

ना सखि भगवन !

6-)

महिलाओं को दास बनाए ।

जो ना पाये वो पछताए ।

दिखता इस का रूप सलोना,

क्या सखि साजन ?

ना सखि सोना !

7-)

नहीं है इसका रूप सुहावन ।

आता जाता सबके आँगन ।

माखन रोटी ले कर भागा ,

क्या सखि साजन ?

ना सखि कागा !

8-)

फूलों से ये गंध चुराता ।

रस पीने को उत्सुक रहता ।

बैठा है पंकज में छिपकर ,

क्या सखि साजन ?

ना सखि मधुकर !

9-)

राखे मुझ को गले लगाकर।

कांधे अपने  नेह लगा कर।

पुछो ना सखि  उसका हाल ,

क्या सखि साजन ?

ना सखि साल !

10-)

गरमी में जब जी उकलाये।

झट पट याद उसी की आए ।

भारत हो या मक्का-मदीना ,

क्या सखि साजन ?

ना पुदीना  !

11-)

जहां- तहां वो मिल ही जाता ।

बच्चों को भी अतिशय भाता ।

चट्टानें हों या हो बालू ,

क्या सखि भालू ?

ना सखि आलू !

कल्पना मिश्रा बाजपेई

मौलिक व अप्रकाशित

Views: 575

Comment

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Comment by kalpna mishra bajpai on February 26, 2014 at 6:20pm

अदरणीया शाशी जी बहुत आभार आपका ।

Comment by shashi purwar on February 26, 2014 at 4:12pm

बहुत सुन्दर प्रयास है आपको हार्दिक बधाई आदरणीया कल्पना जी , 

Comment by kalpna mishra bajpai on February 25, 2014 at 6:49pm

आदरणीय गिरिराज भण्डारी जी बहुत बहुत आभार आपका सर । 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2014 at 6:07pm

आदरनीया कल्पना जी , कह मुकरियों के प्रयास के लिये आपको बधाई ॥

Comment by kalpna mishra bajpai on February 25, 2014 at 3:00pm

अदारनिया प्राची जी आप ने जो सुझाव भेजा है उस पर पूरी तरह से ध्यान दूँगी ।बहुत -बहुत धन्यवाद सादर ......


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on February 25, 2014 at 12:10pm

कहमुकरियों पर कलम आजमाई के लिए बधाई आ० कल्पना मिश्रा बाजपेयी जी 

लेकिन तार्किकता की कसौटी पर ज़रा इन मुकरियों को देखिये 

टिकट बिना भाग ये जाता ।

कोई वाहन इसे ना भाता ।

इसका नहीं है कोई तन ,.......................क्या ये बात साजन के लिए कह सकते हैं ?

क्या सखि साजन ?

ना सखि मन !

दिल को मेरे छू जाती है ।....................यहाँ तो साजन को स्त्रीलिंग ही बना दिया गया 

भावनाओं को सहलातीं है ।................यहाँ भी साजन को स्त्रीलिंग बना दिया 

इन की नहीं है कोई म्यादे ,................यहाँ साजन बहुवचन भी हो जाता है 

क्या सखि साजन ?

ना सखि यादें !

महिलाओं को दास बनाए ।

जो ना पाये वो पछताए ।

मुझे मिला है भर कर दोना ,.........साजन के दोने भर मिलने की बात भी सार्थक नहीं प्रतीत होती... प्यार मिला हो तो पंक्ति से ऐसा ज़ाहिर होना चाहिए 

क्या सखि साजन ?

ना सखि सोना !

नहीं है इसका रूप सुहावन ।

आता जाता सबके आँगन ।

दधि की मटकी ले कर भागा ,......................कागा दही की मटकी लेकर कैसी भाग सकता है , यह भी समझ नहीं आया 

क्या सखि साजन ?

ना सखि कागा !

रखता है वो मेरा ध्यान ।

रखूँ में भी उसे सम्हाल ।

पुछो ना तुम उसका हाल ,

क्या सखि साजन ?

ना सखि साल !...........................यह कहमुकरी भी ज़बरदस्ती हुई प्रतीत होती है 

विधाओं पर सार्थक प्रयास हो, यही शुभकामनाएं हैं 

फिलहाल इस प्रयास पर बधाई 

सादर.

Comment by annapurna bajpai on February 24, 2014 at 8:32pm

tबहुत खूब कल्पना जी , क्या बात है । बधाई आपको । 

कृपया ध्यान दे...

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