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तोड़ नीड़ की परिधि

सारी वर्जनाएं

भुला  नीति रीति

लांघ कर सीमाएं

छोड़ संयम की कतार

दे परवाज़ को विस्तार

वशीकरण में बंधा

लिए एक अनूठी चाह

कर बैठा गुनाह

लिया परीरू चांदनी का चुम्बन

जला बैठा अपने पर

उसकी शीतल पावक चिंगारी से

गिरा औंधें मुहँ

नीचे नागफनी ने डसा

खो दिया परित्राण

ना धरा का रहा

ना गगन का

बन बैठा त्रिशंकु

वो उन्मत्त परिंदा

**************

 (मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 24, 2014 at 4:34pm

प्रिय प्राची जी प्रस्तुति पर आपका अनुमोदन मिला दिल से आभारी हूँ .


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on March 24, 2014 at 4:09pm
बहुत खूबसूरती से लीक से भटकते व्यक्तित्व की परिणति को प्रस्तुत किया है
हार्दिक बधाई इस कथ्यसान्द्र प्रस्तुति पर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 21, 2014 at 5:28pm

हार्दिक धन्यवाद अरुण श्रीवास्तव जी. 

Comment by Arun Sri on March 21, 2014 at 12:28pm

अच्छा लिखा है आपने ! :-))


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 21, 2014 at 9:34am

बहुत- बहुत शुक्रिया राम शिरोमणि जी आपको रचना पसंद आई. 

Comment by ram shiromani pathak on March 20, 2014 at 9:42pm

लिया परीरू चांदनी का चुम्बन

जला बैठा अपने पर

उसकी शीतल पावक चिंगारी से

गिरा औंधें मुहँ

नीचे नागफनी ने डसा

खो दिया परित्राण

ना धरा का रहा

ना गगन का

बन बैठा त्रिशंकु///////ज़ोरदार कहन.. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति  आदरणीया।।।।। हार्दिक बधाई आपको 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 16, 2014 at 9:39am

बहुत- बहुत शुक्रिया आ ० अखिलेश जी रचना के अनुमोदन हेतु. 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on March 14, 2014 at 10:16pm

आदरणीया राजेशकुमारीजी,

न समझदारी है, और न होश,

किसी काम का नहीं है जोश।

परिणाम वही होना था जो हुआ । अच्छी रचना , हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 14, 2014 at 11:30am

बहुत- बहुत शुक्रिया जीतेन्द्र जी, रचना ने आपको प्रभावित किया | हार्दिक आभार. 

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on March 14, 2014 at 10:34am

बहुत ही गहरी व् प्रभावशाली रचना, आदरणीया राजेश जी आपको हार्दिक बधाई

कृपया ध्यान दे...

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