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मेरे पन्ने (प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा)

मेरे पन्ने 

-----------
जीवन पृष्ठ मेरे
हाथों में तेरे
खुली किताब की तरह
कुछ
चिपके पन्ने
कह रहे
दास्तान पढ़ने को
है अभी बाक़ी
लौट आया हूँ फिर
चाहता हूँ
रुकूँ अभी
हवा के तेज झोंके
जीवन पृष्ठों को
तेजी से बदलते हुए
चिपका हूँ
दीवार के साथ
बूझेगा अब कौन
न है मधुशाला
न उसमे साकी
मौलिक और अप्रकाशित
प्रदीप कुमार सिंह कुशवाहा
१५ मार्च २०१४

Views: 395

Comment

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Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2014 at 10:26am

आदरणीय भंडारी सर जी आपका प्रोत्साहन मुझे आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है 

सादर 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2014 at 10:25am

आदरणीय केवल प्रसाद जी सादर अभिवादन, होली आपको भी सपरिवार शुभ हो. 

Comment by PRADEEP KUMAR SINGH KUSHWAHA on March 20, 2014 at 10:24am

आदरणीय श्री ओम प्रकाश जी , सादर आभार 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 17, 2014 at 9:46am

आदरणीय प्रदीप भाई , यथार्थ की सुन्दर अभिव्यक्ति के लिये बहुत बधाइयाँ ॥

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 16, 2014 at 9:24pm

आदरणीय जी,  सुन्दर रचना पर हार्दिक बधार्इ स्वीाकारें।  आपको सपरिवार होलिकोत्सव की शुभकामनाओं सहित हार्दिक बधार्इ।  सादर

Comment by Omprakash Kshatriya on March 16, 2014 at 7:32am

यथार्थ ..............

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