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गजल (रहनुमा)

2122 2122 2122 2122

इस शहर मैं रस्मे-आमद लोग इस तरह निभाते हैं
हाथों मैं गुल होते नहीं और पत्थर लिए नजर आते हैं

तेरी सूरत मेरी सूरत से हसीं नहीं बताने को ये
आने वाले हर शख्स को वो आईना दिखलाते हैं

वो भी देख लें कभी गिरेवां मैं अपने झांककर यारों
दूसरों पे जो यूँ ही अक्सर उँगलियाँ ऊठाते हैं

मैं जो निकला हूँ सफर पे तो मंजिल पा ही लूँगा कभी
फिर क्यूँ मुझे मेरी मंजिल का पता बतलाते हैं

जाने किस भेष मैं सामने आ जाये कातिल कोई तेरा
बचके रहना कातिल भी यहाँ रहनुमा नजर आते हैं

( मौलिक एवं अप्रकाशित )

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Comment by गिरिराज भंडारी on March 24, 2014 at 11:03am

आ. सचिन भाई , ग़ज़ल का बहुत बेहतर प्रयास हुआ है , आपको बधाइयाँ ॥ आ. वीनस भाई का इशारा जरूर समझियेगा ॥

Comment by वीनस केसरी on March 24, 2014 at 12:52am

रदीफ़ काफिये का सुन्दर निर्वाह हुआ है ,,, शब्द अपने भाव को सम्रेषित करने में समर्थ हैं बस बहर को ले कर थोड़ी उलझन है वो भी जल्द ही दूर होगी

शुभकामनाएं


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on March 23, 2014 at 9:43am

सचिन देव जी आपके मिसरे प्रदत्त बह्र में फिट नहीं होते कृपया दुबारा जांच लें ,अच्छी ग़ज़ल बन सकती है ,शुभकामनायें 

Comment by बृजेश नीरज on March 22, 2014 at 10:29pm

आपने जिस बहर का जिक्र किया है उसमें यह अशआर किस तरह फिट बैठता है, कृपया स्पष्ट करने का कष्ट करें.

//इस शहर मैं रस्मे-आमद लोग इस तरह निभाते हैं
हाथों मैं गुल होते नहीं और पत्थर लिए नजर आते हैं// 

सादर!

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