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ग़ज़ल :- कितने गडबड झाले हैं

ग़ज़ल :- कितने गडबड झाले हैं

कितने गडबड झाले हैं ,

और हम बैठे ठाले हैं |

 

तेल खेल ताबूत तोप में ,

घोटाले घोटाले हैं |

 

राजनीति अब शिवबरात है ,

नेताजी मतवाले हैं |

 

कलम की पैनी धार कुंद है ,

बाजारू रिसाले हैं |

 

बिकता नहीं साहित्य आजकल ,

विज्ञापन के लाले हैं |

 

सुई गड़ाकर दूह रहे सब ,

गोमाता को ग्वाले हैं |

 

क्या गाऊँ श्रृंगार की कविता ,

मुंह में सच के छाले हैं |

 

नहीं गये अँग्रेज़ आज भी ,

शासक लाठी वाले हैं |

 

न्याय की आँखों पर हैं पट्टी ,

मुंह पर भय के ताले हैं |

 

("बैठे ठाले "के लिये नवीन जी का आभारी हूँ ..अभिनव अरुण ११-०२-११)

 

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Comment

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Comment by Abhinav Arun on February 18, 2011 at 1:18pm
शुक्रिया आर एन तिवारी और अश्वनी कुमार शर्मा जी |स्नेह बनाए रखिये |आभार |
Comment by R N Tiwari on February 17, 2011 at 10:05am
प्रियवर पाण्डेय जी,
अति  सुन्दर और सामयिक  रचना .बहूत बहूत बधाई.
Comment by ASHVANI KUMAR SHARMA on February 17, 2011 at 1:21am

 

अच्छी रचना बधाई 

 

Comment by Abhinav Arun on February 13, 2011 at 12:13pm
आदरणीय वंदना जी और श्री वीरेंद्र जी आपने रचना पसंद की आभारी हूँ |स्नेह बनाये रखिये लेखन को बल और उर्जा सकारात्मक आलोचनाओं से ही मिलती है |
Comment by Veerendra Jain on February 12, 2011 at 6:05pm

बिकता नहीं साहित्य आजकल ,

विज्ञापन के लाले हैं |

 

सुई गड़ाकर दूह रहे सब ,

गोमाता को ग्वाले हैं

 

ek aur behatarin gazal ke liye badhai..arun ji...

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