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आज चिलमन में तेरा रहना है मंजूर नहीं

2122   1222  2122   22/112

दिल से ज्यादा हमें करता कोई मजबूर नहीं

रोज कहता कि घर है उनका बहुत दूर नहीं

 

मैकदे की चुनी खुद मैंने डगर है साकी

रिंद के दिल में तू रहती है कोई हूर नहीं

 

आज सागर पिला दे पूरा मुझे ऐ साकी

रिंद वो क्या नशे में जो है हुआ चूर नहीं

 

गर जो होती नहीं मजबूरी वो आती मिलने

प्यार मेरा कभी हो सकता है मगरूर नहीं

 

रुख पे बिखरी तेरी जुल्फों ने सितम ढाया  है

आज चिलमन में तेरा रहना है मंजूर नहीं

 

यार  माना कि पी सागर से  है मैंने छककर

बेटी अंगूर की पी यूं तू  मुझे घूर नहीं  

 

  

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on May 9, 2014 at 7:04pm

सुंदर भावों की सुंदर गजल   … हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ आशुतोष ज़ी 

Comment by अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव on May 9, 2014 at 6:28pm

आदरणीय आशुतोष भाई

अच्छी गज़ल हुई है , हार्दिक बधाई 
रिंद के दिल में तू रहती है कोई हूर नहीं// तू रहता है होना चाहिये ( गज़ल के जानकार ही सही बतायेंगे )

सादर

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