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Dr Ashutosh Mishra's Blog (134)

कोरोना का तांडव

पंख कटे पंछी हुए ,सीमित हुयी उड़ान

सर पे अम्बर था जहाँ, छत है गगन समान

सारी दुनिया सिमट कर कमरे में है कैद

घर के बाहर है पुलिस, खड़ी हुई मुश्तैद

जिनकी शादी ना हुयी , उनकी मानो खैर

और हुयी जिनकी न लें, घर वाली से बैर

घर के कामो में लगें, हर विपदा लें टाल

साँप छुछूंदर गति न हो, करफ्यू या भूचाल

भागवान से लड़ नहीं, बात ये मेरी मान

भागवान के केस में, चुप रहते भगवान

प्रथम दिवस आखिर कटा, साँसों में थे…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 26, 2020 at 7:54pm — 2 Comments

कोरोना का क्या रोना

जितना हो सकता हो दूरियां बनाइये

मुख से न कहके नयन से जताइये


घबराइये न दिल को दिलासा दिलाइये

विपदा की घड़ी में भी बस  मुस्कुराइये


जीभर  के बात अपनी सबको सुनाइये

बस थोड़ा और अपने मुँह को घुमाइये


घर जो आये हाथ  सोप से धुलाइये

पी के नींबू नींद भी गहरी लगाइये


बस प्राणायाम योग  ध्यान आजमाइये

प्रतिरोध…
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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 25, 2020 at 1:43am — 3 Comments

नन्ही सी चीटी हाथी कि ले सकती जान है

नन्ही सी चीटी  हाथी की ले सकती जान है

कोरोना ने कराया हमें इसका भान है।

हाथों को जोड़ कहता सफाई की बात वो

पर तुमको गंदगी में दिखी अपनी शान है।

बातें अगर गलत हों तो वाजिव विरोध है

सच का भी जो विरोध करे बदजुबान है।

नक़्शे कदम पे तेरे क्यूँ सारा जहाँ चले

बातों में बस तुम्हारी ही क्या गीता ज्ञान है

कोरोना की ही शक्ल में नफरत है चीन की

जिसके लिए जमीन ही सारी जहान है

मालिक के दर पे सज्दा वजू करके  ही…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on March 19, 2020 at 12:30pm — 4 Comments

फूलीं में रस था भवरों की चाहत बनी रही

जब तक भरे थे जाम तो महफ़िल सजी रही

फूलों में रस था भँवरों की चाहत बनी रही

वो सूखा फूल फेंकते तो कैसे फेंकते

उसमे किसी की याद की खुशबू बसी रही

उस कोयले की खान में कपड़ें न बच सके

बस था सुकून इतना ही इज्जत बची रही

कुर्सी पे बैठ अम्न की करता था बात जो

उसकी हथेली खून से यारों सनी रही

दौलत बटोर जितनी भी लेकिन ये याद रख

ये बेबफा न साथ किसी के कभी रही

'आशू' फ़कीर बन तू फकीरीं में है मजा

सब छूटा कुछ बचा…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on January 28, 2020 at 12:00pm — 7 Comments

इजाजत हो तुम्हारी तो चिरागों को बुझा लूँ मैं

नजर अपनी उठा लो तो गिले शिकवे भुला लूँ मैं

मुझे बस एक पल दे दो है क्या दिल में बता लूँ मैं

निगाहें तो मिला लेता मगर ये खौफ है दिल में

कही ऐसा न हो दिल का चमन खुद ही जला लूँ मैं

कभी तो मेरी गलियों से मेरा वो यार गुजरेगा

मेरा भी फ़र्ज़ बनता है गुलों से रह सजा लूँ मैं

तुम्हारे पग जहाँ पड़ते वहीं पर फूल खिल जाते

है हसरत दिल के सहारा में हसीं गुल इक ऊगा लूँ मैं

अगर ओंठों से निकली शै तो हंगामा…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on February 9, 2019 at 11:20am — 1 Comment

रिश्तों में दूरी

रिश्तों में दूरी 

जब से मैंने अपने दोस्त को

सूरज के बड़े होकर भी छोटे लगने में

धरती से उसकी दूरी की भूमिका समझाई है

बड़ा दिखने के लिए कद बढाने की जगह

दोस्त मुझसे लगातार दूरियां बढ़ा रहा है

ताकि मैं मान लूं वो बृहत् आकार पा रहा है

पर दूरी के कारन छोटा नजर आ रहा है 

मौलिक व अप्रकाशित 

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 29, 2018 at 10:55am — 6 Comments

सौदागर

सौदागर

” प्रोफेसर सैन और प्रोफेसर देशपांडे  सरकारी मुलाजिम हैं, तनख्वाह भी एकै जैसी मिलत है लेकिन ई दुइनो जब से निरीक्षक भइ गए हैं तब से प्रोफेसर सैन तो बड़ी बड़ी लग्जरी गाड़ियों में दौरा करत है और बड़े आलीशान होटलों में बसेरा करत हैं लेकिन ..लेकिन बेचारे देशपांडे कभी धर्मशाला में ठहरत हैं तो कभी सरकारी गेस्ट हाउसन  में ...कभी ऑटो से चलत हैं तो कभी बस में ....जब सब सुख सुबिधा बरोबर है तब  ई फरक काहे है ई बात  तनिक हमरी  समझ में नाहीं  आवत है  “ राहुल ने अपने मित्र सुजीत से बडी…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 19, 2018 at 1:54pm — 9 Comments

मेरी आँखों में कभी अक्स ये अपना देखो

मेरी आँखों में कभी अक्स ये अपना देखो

इस बहाने ही सही प्यार का सहरा देखो

बेखबर गुल के लवों को छुआ ज्यों भँवरे ने

ले के अंगड़ाई कहा गुल ने ये पहरा देखो

वो नजाकत से मिले फिर उतर गये दिल में

अब कहे दिल की सदा हुस्न का जलवा देखो

मौला पंडित की लकीरों पे यहाँ सब चलते

तुम लकीरों से हटे हो तो ये फतवा देखो

वो भिखारी का भेष धरके बनेगा मालिक

अब सियासत में यूं ही रोज तमाशा देखो

साइकिल हाथ के हाथी के हैं जलवे देखे

अब कमल खिलने…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 27, 2018 at 5:30pm — No Comments

यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

11212 11212 11212 11212 

यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

जो टंगी कहीं थी जमाने से खड़ा अब उसी पे सवाल है

 

कई जानवर रहे घूमते बिना फिक्र के बिना खौफ के

हुए क़त्ल जब कोई समझा था बड़े काम वाली ये खाल है

 

कई हुक्मरान हुए  यहाँ सभी आँखे बंद किये रहे

कोई खोल बैठा जो आँख है सभी कह उठे ये तो चाल है

 

ये सियासतों का समुद्र है यहाँ मछलियों सी हैं कुर्सियां

सभी हुक्मरान सधी नजर सभी ने बिछाया जाल…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 4, 2018 at 6:00pm — 10 Comments

आप वादे बड़े  खूब करते रहे

२१२ २१२  २१२  २१२

हम तो बस आपकी राह चलते रहे

ये ख़बर ही न थी आप छलते रहे

बादलों से निकल चाँद ने ये कहा

भीड़ में तारों की हम तो जलते रहे

हिम पिघलती हिमालय पे ज्यों धूप  में

यूँ हसीं प्यार पाकर पिघलते रहे

चांदनी भाती , आशिक हूँ मैं चाँद का 

सच कहूं तो दिए मुझको  खलते रहे

जुल्फ की छांव में उनके जानो पे सर

याद करके वो मंजर मचलते रहे

एक दूजे को हम ऐसे देखा किये

अश्क आँखों से…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on May 2, 2018 at 2:30pm — 14 Comments

बदला परिवेश

“सर, दरवाजा खोलिए” प्रोफेसर राघव की शोध छात्रा नूर ने दरवाजे पर दस्तक देते हुए आवाज दी

“अरे! नूर तुम, दोपहर में अचानक, कैसे?” दरवाजा खोलते हुए प्रोफेसर राघव ने आने की वजह जाननी चाही

“ हाँ सर, एक रिसर्च पेपर में करेक्शन के लिए आई थी”

“ पर अभी तो मैडम घर पर नहीं हैं,और बाज़ार से कब तक लौटें इसका भी अंदाज नहीं है,आखिर तुम कब तक इस धूप में बाहर इंतज़ार करोगी”  प्रोफेसर राघव् ने त्वरित जवाब  दिया

“ बाहर क्यों सर ?” नूर ने कौतूहल से…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on November 26, 2017 at 2:30pm — 11 Comments

जनाजा

“क्या पढ़ रही हो बेटा, लैपटॉप पर इस कदर आखें गडाये?”-साहित्यकार मनमोहन ने अपनी बेटी रूपा से सवाल किया

“कुछ नहीं पापा, साहित्य सेवा मंच पर प्रकाशित रुपेश जी की कहानी पढ़ रही हूँ, लेकिन पापा इस शानदार रचना पर किसी की कोई भी प्रतिक्रिया नहीं है” रूपा ने जवाब देते हुए प्रश्न किया

“शानदार रचना! नहीं बेटा बड़ी कमियाँ हैं इसके लेखन में“

“कमियाँ हैं! कमियां हैं तब तो आपको निश्चित रूप से मंच से जुड़े हर सदस्य को इस पर प्रतिक्रिया करनी चाहिए थी”

“ हाँ, बेटा तुम सही कह रही हो, लेकिन ये… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on November 13, 2017 at 11:41am — 13 Comments

डूबता जहाज

"सारा शहर दिवाली के जश्न में डूबा है और तुम किस सोच में डूबे हो" दिवाली की पूजा ख़त्म होने के बाद राहुल से मुलाकात करने गए उसके मित्र रोहित ने उसकी ओर मुखातिब होते हुए पूंछा।

" कुछ नहीं! दिवाली मनाते हुए तो सालों गुजर गए पर आज न जाने क्यों दिवाली मुझे मेरी पहली मुहब्बत सी लगी"

"वो कैसे"

" अरे!पहली बार मुहब्बत में आँखों को जो कुछ भी भाया था उसके खतरे को भी नाक ने सूँघा था और फिर सारा दर्द दिल को ही हुआ था। और आज आतिशबाजी देखकर नाक खतरे से आगाह कर रही है पर सारा दर्द सारी तकलीफ दिल… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on October 20, 2017 at 11:21am — 11 Comments

हुआ क्या आपको जो आप कहती बढ़ गयी धड़कन

अजब सी है जलन दिल में ये कैसी है मुझे तड़पन

उसे अहसास तो होगा बढ़ेगी दिल की जब धड़कन'

दिखा है जबसे उसकी आँखों में वीरान इक सहरा

मुझे क्या हो गया जाने कहीं लगता नहीं है मन

गले को घेर बाँहों से बदन करती कमाँ जब वो'

मुझे भी दर्द सा रहता मेरा भी टूटता है तन

वो रो लेती पिघल जाता हिमालय जैसा उसका गम

मगर सूरज के जैसे जलता रहता है मेरा तन मन

'नज़र मिलते ही मुझसे वो झुका लेते हैं यूँ गर्दन

ये मंज़र देख उठती है लहर…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2017 at 4:30pm — 14 Comments

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके

१२२२ १२२२ १२२२ १२२२

घरोंदों को जलाया है किसी ने दोस्ती करके 

चिरागों को बुझाया है किसी ने दोस्ती करके 

सुकूं था जिसके जीवन में जिसे आती थी मीठी नींद 

उसे शब् भर जगाया है किसी ने दोस्ती करके 

जो दुश्मन था जमाने से जो प्यासा था लहू का ही 

उसी को अब बचाया है किसी ने दोस्ती करके 

अँधेरे में मेरा साया हुआ कुछ इस तरह से गुम

ज्यूँ रिश्ता हर भुलाया है किसी ने दोस्ती करके 

फकीरों की तरह जीता, था खुश तन्हाई…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on September 8, 2017 at 5:27pm — 5 Comments

पूर्वजों की विरासत

हे महान पूर्वजों गर्व करो

हम निखार रहे हैं

वो तमाम सम्पदा

जो सौंपी थी तुमने, हमें बिरासत में...

बहुत घने हो गए थे जंगल

खो जाते थे बेश- कीमती हांथी दांत

गल जाती थी शेर की खाल

हो जाता था सदैव

तुम्हारी सम्पदा का नुक्सान,

सहन नहीं होता था ये हमसे

इसलिए मार दिए हमने हांथी और शेर

काट दिए जंगल,

बना लिए सोफे, बेड, ड्रेसिंग टेबल और मकान,

इनपे बैठे , लेटे अपना चेहरा जब भी संवारते हैं

मकान में सजे हांथी दांत और शेर की खाल ,

पूरी… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on September 5, 2017 at 11:47am — 2 Comments

खुद आंसू पीते हैं

अहदे नौ में
माएं दूध पिलाती नहीं हैं
गायें भैसें  कसाईयों से बच पाती नहीं हैं
इससे तकलीफ उन्हें नहीं होती है
जो खरीद सकते हैं दूध
सोने की कीमतों पर…
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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 22, 2017 at 5:51pm — 10 Comments

दो कवितायें

दो कवितायें

 

दोस्त

जब मेरे पास दोस्त थे

तब दोस्तों के पास कद हद पद नहीं थे

और जब दोस्तों के पास पद हद कद थे

मेरे पास दोस्त नहीं

 

धन 

 जब मेरे पास धन नहीं था

तब समझते थे सब मुझे बदहाल

पर मैं खुश था , बहुत खुश था

और जब मेरे पास है अकूत सम्पति

दुनिया मुझे खुशहाल समझती है

और मैं  तडपता हूँ बिस्तर पर

नींद के सुकून से भरे एक झोंके के…

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Added by Dr Ashutosh Mishra on April 18, 2017 at 3:10pm — 10 Comments

अपूर्ण रह जाती है मेरी हर रचना -आशुतोष

अपनी जाई

गोद में खिलाई

लाडली सी बिटिया

जो कभी फूल

तो कभी चाँद नजर आती है/

जिसके लिए पिता का पितृत्व

और माँ की ममता

पलकें बिछाते हैं;

किन्तु उसी लाडली के

यौवन की दहलीज पर कदम रखते ही,

उसके सुखी जीवन की कामना में जब

उसके हमसफ़र की तलाश की जाती है/

तब उसके चाल चलन

उसकी बोली , उसकी शिक्षा

रंग रूप , कद काठी

सब कुछ जांची परखी जाती है .....

किसी की नजर तलाशती है

उसमे काम की क्षमता

कोई ढूंढता है… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on March 4, 2017 at 11:33am — 9 Comments

सूंदर है हर रचना

सुंदर है हर रचना

रवि! बड़े परेशान लग रहे हो -क्या बात है"-रवि के जिगरी दोस्त अनिल ने बड़े ही सहज भाव से पूछा। "कुछ नहीं- बस यूँ ही" प्रत्यूतर में रवि ने कहा।"अरे!कुछ तो होगा ....तभी तो..."अनिल ने रवि ने वास्तविक कारण जानने के उद्देश्य से दुबारा पूंछा।"भाई जी-बस यूँ ही-अपनी नयी रचनाओं को लेकर परेशान था,अथक प्रयास के बाद भी रचनाओ में वो सुंदरता नहीं दिख पा रही है, जो सुंदरता के मानदंडों पर खरी उतर सके"अनिल को अपनी परेशानी से अवगत कराते हुए रवि न जवाब दिया।कुछ देर गंभीरता के साथ सोचने के बाद… Continue

Added by Dr Ashutosh Mishra on February 28, 2017 at 11:40am — 12 Comments

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