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चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

२१२२  २१२२   २१२२२

 

रहनुमा वो कह गया है क्या इशारों में

चारसू उठता धुंआ ही अब नजारों में

 

धुंध कुछ छाई है ऐसी अब फलक पे यूं

रोशनी मद्दिम सी लगती चाँद तारों में

 

साजिशों की आ रही है हर तरफ से बू

छुप के बैठी हैं खिजाएँ अब बहारों में

 

खेलते जो लोग थे तूफाँ में लहरों से

वक़्त ने उनको धकेला है किनारों में

 

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब

क्या पता अहबाब ही हों इन कहारों में

 

हो गयी काफूर अब मुस्कान ओंठों से

हौसला दिखता नहीं अब आबशारों में

 मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by khursheed khairadi on February 3, 2015 at 9:32am

साजिशों की आ रही है हर तरफ से बू

छुप के बैठी हैं खिजाएँ अब बहारों में

 आदरणीय आशुतोष जी सुन्दर ग़ज़ल हुई है |दोस्तों के साथ रहते दुल्हन की डोली का लूट जाना थोड़ा अतार्किक है |सादर अभिनन्दन |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 1, 2015 at 12:06pm

आदरणीय आशुतोष भाई , बढिया ग़ज़ल कही है , दिली दाद कुबूल करें । आ. शिज्जु भाई जी से मै भे सहमत हूं --

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब

क्या पता अहबाब ही हों इन कहारों में    --  तार्किक रूप से ये शे र सही नहीं लग रहा है ।

Comment by ram shiromani pathak on February 1, 2015 at 10:12am
बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीय आशुतोष जी।।हार्दिक बधाई आपको

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 1, 2015 at 9:53am

आदरणीय आशुतोष जी आपकी रचनायें अब बेहतर से बेहतर होती जा रही है इसका उदाहरण ये ग़ज़ल है बहुत बहुत बधाई आपको

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब
क्या पता अहबाब ही हों इन कहारों में - बस यहाँ देखिये कहारों में अहबाब हैं तो दुल्हन महफ़ूज़ क्यों नहीं ये समझ नहीं पा रहा हूँ।
क्षमा सहित

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 30, 2015 at 10:51am

आदरणीय मिथिलेश जी रचना पर आपनी उत्साहित करती प्रतिक्रिया के लिए तहे दिल धन्यवाद ..आपके सवाल के जवाब में मैं सिर्फ ये कहूँगा की जरूरी नहीं मैं सही हूँ ..पर पर्यावaiरण में ओजोन लेयर की बजह से जिसका कारण प्रदूषण है से तापमान के बढ़ने के कारन न तो बर्फ जम पा रही है और न पानी की बूंदे संघनित हो पा रही हैं जिसकी बजह से झरनों में पानी का वो प्रवाह या यों कहने जीवन की चाह परिलक्षित नहीं होती बैसे ही कुछ जीवन में देखने को मिल रहा  है आतंकवाद जैसा कृत्य जीवन को शांति प्रदान करने वाली संस्कृति और प्रेम की ओजोन लेयर को छिन्न भिन्न कर रही है परिणाम स्वरूप अब सब जीवन जी तो रहे हैं पर वो मुस्कान ओंठो से नदारत है .मैंने इस भाव से लिखा था .यदि कोई गलती हो तो संकोच मत करियेगा .मेरा मार्गदर्शन अवश्य करियेगा ..सादर प्रणाम के साथ 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 30, 2015 at 10:43am

आदरणीय गुमनाम जी रचना आपको पसंद आयी ..मेरा लेखन सार्थक हुआ ..आपको तहे दिल धन्यवाद सादर

Comment by Shyam Mathpal on January 29, 2015 at 8:27pm

Aadarniya Dr.Mishra Sb.

Khubsurat gazhal ke liye dheron badhai. Dil ko chune wali rachna.

Comment by दिनेश कुमार on January 29, 2015 at 6:36pm
वाह वाह ...सर जी। बहुत अच्छी ग़ज़ल हुई है।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on January 29, 2015 at 12:04pm

है नहीं महफूज दुल्हन डोलियों में अब

क्या पता अहबाब ही हों इन कहारों में.......

बहुत ही गहरी बात कही आ० भाई आशुतोष जी , हार्दिक बधाई l

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on January 29, 2015 at 9:35am

वाह! आदरणीय डा. आशुतोष जी, बेहद खूबसूरत गजल

साजिशों की आ रही है हर तरफ से बू

छुप के बैठी हैं खिजाएँ अब बहारों में

 

खेलते जो लोग थे तूफाँ में लहरों से

वक़्त ने उनको धकेला है किनारों में........बहुत खूब. विशेष बधाई स्वीकार करें

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