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सौदागर

” प्रोफेसर सैन और प्रोफेसर देशपांडे  सरकारी मुलाजिम हैं, तनख्वाह भी एकै जैसी मिलत है लेकिन ई दुइनो जब से निरीक्षक भइ गए हैं तब से प्रोफेसर सैन तो बड़ी बड़ी लग्जरी गाड़ियों में दौरा करत है और बड़े आलीशान होटलों में बसेरा करत हैं लेकिन ..लेकिन बेचारे देशपांडे कभी धर्मशाला में ठहरत हैं तो कभी सरकारी गेस्ट हाउसन  में ...कभी ऑटो से चलत हैं तो कभी बस में ....जब सब सुख सुबिधा बरोबर है तब  ई फरक काहे है ई बात  तनिक हमरी  समझ में नाहीं  आवत है  “ राहुल ने अपने मित्र सुजीत से बडी जिज्ञासा के साथ पूंछा

“ अरे ! ईमें कौन बात है , प्रोफेसर सैन के बाप दादा ने खूब पैसा कमाया होगा और उसी के दम पर वो शाही जिन्दगी जिया करत हैं “

“ अरे !  काहे का बाप दादा का पैसा , हम ई प्रोफेसर साहिब के बाप का भी इतिहास जानत हैं और बाबा का भी ...एक छोटी सी राशन की दुकान की दम पर दुई वक़्त की रोटी बड़ी मुश्किल से नसीब होती थी “

“ अरे ! तो हो सकता है सैन साहिब सौदागर हों “

“सौदागर, कईसन सौदागर ....बिन दूकान , बिन सौदा के ई कैसे सौदागर हुयी सकत है “ झुंझलाते हुए राहुल ने सुजीत से सवाल किया

“ अरे !सौदागर बने के खातिर ई कौन जरूरी है कि सौदा भी हो और दुकान भी – अरे सौदा जमीर का भी तो हुए सकत है “ सुजीत ने गंभीर होते हुए कहा

मौलिक व अप्रकाशित 

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Comment by Neelam Upadhyaya on September 26, 2018 at 4:19pm

आदरणीय  आशुतोष मिश्रा जी, नमस्कार। अच्छी  लघुकथा की प्रस्तुति के लिए बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2018 at 1:31pm

आदरणीय लक्ष्मण जी आदरणीय समर सर , भाई ब्रिजेश जी , आदरणीय विजय सर आप सबकी प्रतिक्रिया से उत्साहित महसूस कर रहा हूँ . रचना पर आप सबकी प्रतिक्रिया के लिए ह्रदय से आभारी हूँ सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on September 26, 2018 at 1:29pm

आदरणीय शेख शहजाद उस्मानी जी आपके मशविरे मेरे लिए बेशकीमती होते हैं लघु कथा बिधा पर लिखने का प्रयास आपकी रचनाओं को पढ़कर ही शुरू किया है और लगातार आपकी रचनाएं पढता हूँ .मशविरे के लिए ह्रदय से आभारी हूँ आपके मार्गदर्शन के अनुरूप फिर प्रयास करूंगा ..सादर 

Comment by vijay nikore on September 24, 2018 at 6:40am

लघुकथा अच्छी लगी। बधाई आदरणीय आशुतोष जी।

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 21, 2018 at 10:30am

बिलकुल सही जगह पे चोट करती हुई लघुकथा..वाह

Comment by Samar kabeer on September 19, 2018 at 10:32pm

जनाब डॉ.आशुतोष मिश्रा जी आदाब,अच्छी लघुकथा हुई है,इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on September 19, 2018 at 5:47pm

आ. भाई आषुतोश जी, बेहतरीन कथा हुयी है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 19, 2018 at 3:14pm

विरम चिन्ह संबंधित कुछ टंकण त्रुटियां रह गई हैं!

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 19, 2018 at 3:13pm

 बेहतरीन क्षेत्रीय भाषा-संवादों में जमीर के सौदे और सौदागरों की हक़ीक़त पर ध्यान आकृष्ट कराती बढ़िया लघुकथा हेतु सादर हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं मुहतरम जनाब डॉ. आशुतोष मिश्रा  साहिब। पहले लम्बे संवाद में बीच में उस पात्र की गतिविधियों या भावों को संक्षेप में कहकर उस संवाद को दो या तीन भागों मेन बांटा जा सकता है मेरे विचार से , या फिर उस संवाद के बीच-बीच में दूसरे पात्र के जवाबी लघु संवाद जोड़कर। सादर।

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