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यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

11212 11212 11212 11212 

यहाँ जिंदा की है खबर नहीं यहाँ फोटो पे ही वबाल है

जो टंगी कहीं थी जमाने से खड़ा अब उसी पे सवाल है

 

कई जानवर रहे घूमते बिना फिक्र के बिना खौफ के

हुए क़त्ल जब कोई समझा था बड़े काम वाली ये खाल है

 

कई हुक्मरान हुए  यहाँ सभी आँखे बंद किये रहे

कोई खोल बैठा जो आँख है सभी कह उठे ये तो चाल है

 

ये सियासतों का समुद्र है यहाँ मछलियों सी हैं कुर्सियां

सभी हुक्मरान सधी नजर सभी ने बिछाया जाल है

 

कहीं थे लहू-लुहां जिस्म ही कहीं घर जले कहीं तन मगर

रहे नेता अपनी ही घात में सभी ने कहा क्या हाल है

 

थे लहू से ही सने जिनके कर वो सफ़ेद पोश हैं  हुक्मरान

नहीं खौफ है किसी का इन्हें रखी सबने उम्दा सी ढाल है

मौलिक व प्रकाशित

 

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 7, 2018 at 11:27am

आदरणीय तेजवीर जी  आदरणीय लक्ष्मण जी आदरणीय सोमेश जी आदरणीय नवीन जी रचना को आप सबका आशीर्वाद मिला मैं ह्रदय से आभारी हूँ / सादर 

Comment by somesh kumar on May 6, 2018 at 11:03pm

Samayik rajnit ko drishtigat rkhte hue achchi gazal likhi aapne

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on May 6, 2018 at 5:02pm

आ. भाई आषुतोष जी, सुंदर गजल हुइ है । हार्दिक बधाई ।

Comment by Naveen Mani Tripathi on May 6, 2018 at 4:24pm

बहुत अच्छा प्रयास । कबीर साहब की बात महत्वपूर्ण होती है ।

Comment by TEJ VEER SINGH on May 6, 2018 at 11:23am

हार्दिक बधाई आदरणीय डॉ आशुतोष मिश्रा जी।बेहतरीन गज़ल।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 5, 2018 at 6:21pm

आदरणीय सर आपकी इस अनमोल सलाह का ख्याल आगे से अवश्य रखूँगा और जल्दबाजी से बचने की कोशिस करूंगा।या ग़ज़ल की गलतियों पर आपका और आदरणीय नीलेश जी का थोडा और मार्गदर्शन चाहिए। आप सबके मार्गदर्शन से ही सीख रहा हूँ ।किसी एक शेर को आप दुरस्त कर दीजियर तदनुसार मैं आगे प्रयास करूंगा सादर प्रणाम के साथ

Comment by Samar kabeer on May 5, 2018 at 4:03pm

जबाब डॉ.आशुतोष मिश्रा जी आदाब, ग़ज़ल का प्रयास अच्छा है,बधाई स्वीकार करें ।

ग़ज़ल कभी आनन फानन कहने की विधा नहीं है,इसमें एक एक शब्द नाप तोल कर रखा जाता है, पहले इत्मीनान से ग़ज़ल कहें फिर एक पाठक की तरह उसका अध्यन करें,तब आप अपनी कमी ख़ुद समझ लेंगे ।

Comment by Shyam Narain Verma on May 5, 2018 at 11:50am
इस लाजवाब, उम्दा ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई   सादर
Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 5, 2018 at 8:57am

  आदरणीय भाई नीलेश जी इस बेशकीमती मशविरे के लिए हृदय से आभारी हूँ अभी तक जितनी ग़ज़ल बड़ी बहर में लिखी हैं उसमे इस तरह की कमियां आप सभी ने पूर्व में इंगित की थी कल समाचार सुनते ही बिचार मन ने उठा और आनन् फानन में लिख कर पोस्ट कर दी लेकिन आदरणीय आपजी बात को मैं और भली तरह समझ सकूंगा  आप थोडा और विस्तार से बताएं कसावट में कमी तो मुझे भी लग रही है लेकिन कैसे ठीक करू सोच रहा हूँ हार्दिक धन्यवाद के साथ सादर

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 5, 2018 at 8:11am

आ. डॉ आशुतोष जी,
कठिन बहर पर ग़ज़ल कहने का अच्छा प्रयास हुआ है. ग़ज़ल के भाव भी बहुत अच्छे हैं लेकिन मिसरों में आवश्यक कसावट कम है.. वाक्य रचना भी थोड़ी उलझी हुई है ..
ग़ज़ल को थोडा समय और दीजिये... और शेर की जगह   मिसरा कहने का प्रयास कीजिये.. मिसरा मिसरा कसता जाएगा फिर ग़ज़ल अपने  आप बोलने लगेगी 
सादर 

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