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रावनो को लक्ष्मनी रेखा नहीं

२१२२ २१२२ २१२


है वतन में कोई भी भूखा नहीं !
लगता है पूरा वतन देखा नहीं

रोटियाँ हाथों में ले रोते रहे
कह रहे थे क्यूँ मिला चोखा नहीं

जुल्म के बाजार कितने भी फलें
रावनो को लक्ष्मनी रेखा नहीं

फूटते ही हैं नहीं घाट पाप के अब
पाप-पुण्यों का कोई लेखा नहीं

फट गयी धरती वहां पर प्यास से
पर यहाँ इक बूँद भी सोखा नहीं

सब हमें छलते रहे हैं रात-दिन
सोचते आशू कहाँ धोखा नहीं


मौलिक व अप्रकाशित

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Comment by Satyanarayan Singh on May 22, 2014 at 10:23pm

डॉ. आशुतोष जी इस प्रस्तुति पर सादर बधाई स्वीकार करें आदरणीय 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on May 14, 2014 at 4:35pm

ग़ज़ल के अरुज को हिन्दी पद्य नियमों में स्वीकार्य तुकान्तता के सापेक्ष भी ग़ज़ल का काफ़िया असहज है.  
ऐसी प्रस्तुतियों से बचना आवश्यक है आदरणीय
सादर

Comment by Meena Pathak on May 13, 2014 at 10:52am

क्या बात है .... अनुपम .. बधाई | सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 9, 2014 at 11:08am

आदरणीया प्राची जी ..आप ने जिन कमियों के बारे में मुझे जानकारी दी है उन्हें मैं फिर से सुधारने का प्रयत्न करूंगा ...सिनाद दोष के सम्बन्ध में पुनः आदरणीय वीनस जी के लेखों का अध्ययन करूंगा ..मार्गदर्शन और मशविरे के लिए तहे दिल धन्यवाद ,,आप की प्रतिक्रियाए यूं ही सतत मिलती रहे .इसी आकांक्षा के साथ सादर 

Comment by भुवन निस्तेज on May 6, 2014 at 10:54pm
बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति आदरणीय, कृपया आदरणीय डा.प्राची सिंह जी की बात पर गौर फरमाए ....

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on May 6, 2014 at 8:15am

कहन के स्तर पर एक सुन्दर प्रस्तुति 

काफिया निर्धारण दोषपूर्ण हो रहा है आ० आशुतोष जी ..भूखा और देखा में जहां तक मुझे ज्ञात है सिनाद दोष उत्पन्न हो रहा है..इसी तरह सभी हम्काफिया शब्दों को पुनः देख कर आश्वस्त हो लें 

चौथे शेर में घट के स्थान पर घाट टंकित हो गया है.

इस प्रयास पर मेरी शुभकामनाएं 

Comment by coontee mukerji on May 2, 2014 at 3:26am

है वतन में कोई भी भूखा नहीं !
लगता है पूरा वतन देखा नहीं.....बहुत खूब.

Comment by जितेन्द्र पस्टारिया on May 1, 2014 at 10:39pm

सब हमें छलते रहे हैं रात-दिन
सोचते आशू कहाँ धोखा नहीं............दिल को छू गया, दिली बधाई आदरणीय डा. आशुतोष जी

Comment by SURENDRA KUMAR SHUKLA BHRAMAR on May 1, 2014 at 6:36pm

जुल्म के बाजार कितने भी फलें
रावनो को लक्ष्मनी रेखा नहीं

फूटते ही हैं नहीं घाट पाप के अब
पाप-पुण्यों का कोई लेखा नहीं

सुन्दर भाव युक्त और आज के हालात को बयाँ करती अच्छी रचना डॉ आशुतोष भाई ......
नीचे के शब्द क्या यही है
लक्ष्मनी रेखा , घाट पाप के
भ्रमर ५

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